उलूखल बन्धन लीला-29

     श्री कृष्ण ने विचार किया – मैं परमैश्वर्यशाली सहस्रगुण सद्वृत्ति हूँ,तथापि भक्तों के गुण के बिना मेरे गुण पूर्ण नहीं होते। अतएव उन्होंने यशोदा के गुणों से अपने उदर को भर लिया।

षाड्गुण्यं भजतः सहस्रगुणसद्वृत्तेरनन्तात्मनो

नित्यानन्तगुणोल्कसत्- सुचरितस्यापीह मेऽवस्थितिः।

पूर्णत्वं गुणतः प्रयाति न विना मद्भावभाजां  गुणा –

लम्बं जातुच्चिदित्यबोधयदसौ पूर्णोदरस्तद्गुणात् ।।

     अपने भक्त के प्रेमपोषक परिश्रम को भी मैं  नहीं सह सकता, अन्य की तो बात ही क्या है ? मैं माता का खेद दूर करने के लिए अश्लाघ्य बन्धन को भी सह लूंगा।

मत्प्रेमपोषकमपि श्रममात्मभक्त-

देहे सेहे न भुवि जातु कुतस्तदन्यम्।

किं चास्य खेदमपनेतुमहं सहेये –

त्यश्लाघ्यमप्यकृत-बन्धनतः स्फुटं सः।।

     तत्त्वदृष्टि से मुझमें कोई गुण संलग्न नहीं है। यदि गुण क्वचित् भासमान भी हैं तो मध्य में ही (जो आदि-अन्त में नहीं होता वह मध्य में भी नहीं होता, मिथ्या ही भासता है। ) श्रीकृष्ण ने मानो इसी श्रौत तात्पर्य को प्रकट करने के लिए मध्य भाग में ही रस्सी का सम्बन्ध स्वीकार किया।

न मां तत्त्वदृष्ट्या गुणः कोऽपि लग्नः क्वचित्भासमानोऽपि  चेन्मध्य एव ।

इति   श्रौतमर्थं   तदानीमधीशः   स   दाम्ना   स्वमध्येन   मन्ये  व्यतनीत् ।।

     गोकुलगत रज्जुओं से बन्धन अंगीकार करने का अभिप्राय है कि गोकुलवासी ऐन्द्रियक व्यवहार में संलग्न व्यक्ति भी प्रेम से मुझे बाँध लेते हैं, वश में कर लेते हैं।

     महापुरुषों का यह गौरवपूर्ण सद्गुण है कि भले ही कोई उसे न समझे,अभीष्ट कार्य की पूर्ति कर देता है। यह दामोदर-लीला से स्पष्ट है।

     यदि दैववश खलगुण का अपने आप से सम्बन्ध हो जाय तो बन्धन की प्राप्ति अवश्य होती है, भले ही वह महापुरुष ही क्यों न हो। ऊखल एवं रज्जु के सम्बन्ध से श्रीकृष्ण को भी बँधना पड़ा।

     भगवान् श्रीकृष्ण ने माता के मनका निर्बन्ध (आग्रह) देखकर आत्मबंधन स्वीकार कर लिया। भक्त के प्रेम के सामने अपना कार्य गौण हो जाता है।

     भगवान् श्रीकृष्ण अपने मन में परामर्श करने लगे। देवर्षि नारद ने नलकूबर, मणिग्रीव को शाप देकर वृक्ष बना दिया है और यह वचन दे दिया है कि शीघ्र ही व्रजराज कुमार तुम्हें मुक्त कर देंगे। यह ठीक है कि मैं मुक्त हूँ स्वयं और मुक्त करता हूँ दूसरों को तथापि देवर्षि की वाणी ने तबतक के लिए मुझे बन्धन में डाल दिया है जब तक इन दोनों पर कृपा करके मुक्त नहीं कर देता है। यही विचार करके भगवान् ने देवर्षि नारद के वचनों के बन्धन से ही अपने को बद्ध बना लिया। यही तो भक्तवश्यता है। 

मच्छापादचिरेण वां यदुपतिर्मोक्तेति वाचाऽऽर्षया

तावत् बद्ध इवाहमस्मि सततं मुक्तोऽपि मोक्ताऽपि च।

यावद्वार्क्षपदादिमौ न कृपया सम्मोचितावित्यसौ

तद्बन्धात् किमबोधयद् भुवि विभुर्भक्तैकवाग्वश्यताम्।।  

(क्रमशः)

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