उलूखल बन्धन लीला-28

     श्रीहरिसूरि यह विकल्प उठाते हैं कि यशोदामाता ने घर की छोटी-बड़ी सभी रस्सियों को अलग-अलग कृष्ण के कटि-भाग में लगाया अथवा सबको एक साथ ? इनमें -से यदि पहली बात मानी जाय तो यह भाव ध्वनित होता है कि समदर्शी दयानिधान भगवान् में छोटे-बड़े का कोई भेद नहीं है। दूसरी बात यह कि रज्जु ने यह सूचना दी – प्रभु के समान अनन्तता और अनादिता हम क्षुद्रों में कहाँ-से आ सकती है। अतः हम इन्हें बाँध नहीं सकते।

     यदि ऐसा माना जाय कि सभी गुणों (रस्सियों) का प्रयोग एक साथ ही किया गया तो वे सब अनन्त गुण परमात्मा में लीन हो गये। समुद्र में सभी नदियाँ लीन हो जाती हैं। न नाम रहा, न रूप। समुद्र में एक मेरी श्यामता है और दूसरी यमुना की। दो अंगुल की न्यूनता के द्वारा प्रभु ने यह भाव प्रकट किया।

     आश्चर्य तो यह है कि वामन की भाँति अपने रूप को छोटा नहीं किया। त्रिविक्रम के समान बढ़ाया नहीं। रस्सी छोटी नहीं की। उनके पृथक् या युगपत् प्रयोग में कोई बाधा नहीं डाली। फिर भी किसी रूप में श्रीकृष्ण को गुणस्पर्श नहीं हुआ।

     माता की थकान और भूषण-भ्रंश देखकर कृष्ण के हृदय में कृपा का उद्रेक हुआ। वे सोचने लगे- माता के हृदय से द्वैत- भावना दूर नहीं होती तो फिर इसके सम्मुख अपनी असंगता प्रकट करना व्यर्थ है। इस भाव से उन्होंने बन्धन को स्वीकार कर लिया।

न द्वैतमस्या हृदयादपैति  तत् किं वृथा स्वां प्रकटीकरोषि।

 निःसंगतामित्यवधार्य तादृग् दामस्थितेरास विभुः सम्बन्धः।।

भक्त के छोटे-से गुण को भी भगवान् पूर्ण कर देते हैं यही सोचकर छोटी-सी रस्सी को भी अपने बन्धन योग्य पूर्ण बना दिया। 

लघुमपि मद्भक्तगुणं हार्दस्थितितो नयामि पूर्णपदम्।

ध्वनयन्नेवमनन्तो       निन्ये      पूर्णत्वमेतदल्पमपि।।   

(क्रमशः)

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