उलूखल बन्धन लीला-26

     सारार्थदर्शिनीकार चक्रवर्ती विश्वनाथ यह भाव विशद करते हैं – परमेश्वर का प्रेम-परवश होकर बँध जाना दूषण नहीं, भूषण है। आत्माराम की भूख-प्यास, पूर्णकाम की अतृप्ति-तृष्णा, शुद्धसत्त्व का कोप, स्वाराज्य-लक्ष्मी के अधिपति का चौर्य-कर्म, महाकाल के काल का भय-पलायन, मन के अग्रगामी का पकड़ा जाना, आनन्दमय का दुःखरोदन और सर्वव्यापी का बन्धन- यह सब स्वाभाविक भक्त-पराधीनता का प्रदर्शन है। अज्ञानियों के प्रति इसका उपयोग न होने पर भी ब्रह्मा,शंकर, सनत्कुमारादि विज्ञानियों को भी चमत्कृत करके इसका प्रदर्शन किया गया। इसको केवल अनुकरण-मात्र समझना भूल है;क्योंकि आगे ‘तद्विदाम्’ कहा गया है।

     सिद्धान्तप्रदीपकार श्रीशुकदेव का अभिप्राय है कि यह ठीक है, भगवान् में अंतर्बाह्य, पूर्वापर आदि का व्यवहार न होने पर भी उन व्यवहारों का औचित्य भी है। वे अणु-से-अणु और महान्-से-महान् हैं। वे स्वयं अपने संकल्प से बद्ध भी हो सकते हैं। 

     अब श्री हरिसूरि कृत भक्ति-रसायनम् के कुछ भावों का सप्रेम समास्वादन कीजिए। यशोदा ने अपने गुणों= रस्सी एवं सद्गुणों से जितना-जितना उद्योग किया विभु के उदर की पूर्ति के लिए, श्रीकृष्ण ने भी उतने ही उतने अपने गुण असंगता, नित्यमुक्ति आदि को प्रकट किया। अतएव कन्हैया मैया के साथ यह परमानन्द जनक क्रीड़ा  सम्पन्न हो गयी। 

     रज आदि प्राकृत गुण जिनका स्पर्श भी नहीं कर सकते, उन्हें यह छोटा-सा गुण (रस्सी) कैसे बाँध सकेगा? अतएव गुणों का पूरा न पड़ना उचित ही है। 

     इन्द्रियों का बन्धन होता है उनके अधिष्ठाताओं का नहीं। श्रीकृष्ण गोपति-इन्द्रियाधिपति हैं। गोबंधक रज्जु उन्हें नहीं बाँध सकती। 

     यह प्रसिद्ध है कि अध्यस्त ही बद्ध होता है, अधिष्ठान नहीं। इस श्रुत्यर्थ को स्पष्ट करने के लिए विश्वावभासक परमात्मा में बन्धन न लग सका। 

अध्यस्तस्याश्रावि बन्धो जगत्यां नाधिष्ठानस्यांशतोऽपीति कोके।

श्रुत्यर्थस्य ख्यातये नोदरेऽभूद् बन्धस्तस्मिन् विश्वविश्वप्रकाशे।।    

(क्रमशः )

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