उलूखल बन्धन लीला-25

     श्री जीवगोस्वामी ने यह प्रश्न उठाया है कि पहले तो श्रीकृष्ण को पूर्ण और परमेश्वर सिद्ध करते हो। फिर उनमें भूख, प्यास, अतृप्ति, चोरी, भय, पलायन, पकड़ा जाना, रोदन और बन्धन का वर्णन करते हो। इसका कोई न कोई रहस्य अवश्य होना चाहिए और रसिकों के लिए आस्वाद का हेतु भी, अतः वह क्या है ?इसका समाधान करते हैं। यह सर्वथा सत्य है कि श्रीकृष्ण परिपूर्णतम परमेश्वर हैं तथापि उनमें भक्तों के प्रति अनुग्रह भी अवश्य स्वीकार करना चाहिए। यदि अनुग्रह न होगा तो भगवान् के गुण किसी के प्रति सुखकारी नहीं होंगे। कठोर हृदय पुरुषका कुछ भी रुचिकर नहीं होता। फिर वे गुण भी नहीं रहेंगे। जन-सुखकारी धर्म निर्दयता-रूप दोष में परिणत हो जायेंगे। अपहतपाप्मा परमेश्वर के साथ उनकी कोई संगति नहीं लगेगी। अतएव सभी गुणों को गुण बनाने वाला दोषांतर विरोधी भक्ति के अनुरूप कृपा गुण ही भगवान् में स्वीकार करना चाहिए। भक्ति भगवान् को वश में करती है। यह ठीक है तो भगवान् भी भक्ति के वश में होते हैं। इससे उनके ऐश्वर्य में कोई त्रुटि नहीं आती; क्योंकि वे बद्ध दशा में भी नल-कूबर, मणिग्रीव का उद्धार ही करते हैं। इससे सर्वाकर्षण और ऐश्वर्य की वृद्धि होती है। वे स्वयं ही बार-बार कहते हैं – मैं भक्त-पराधीन हूँ। भक्त निष्कपट हैं, मैं भी निष्कपट हूँ। अतः भक्तों के आनन्द के लिये उन-उन भावों का प्रकट होना तात्त्विक ही है। यही देख कर कुन्ती देवी मुग्ध हो गयी थीं। यह भक्तों का मन हरण करने की लीला है। जो अपने भक्त से इतनी ममता कर सकता है कि उसके हाथों बँध जाये तो उसकी भक्ति कोई क्यों नहीं करेगा ?

     श्री वीरराघवाचार्य कहते हैं कि इस भक्तकृत बन्धन से भगवान् की स्वतंत्रता में कोई बाधा  नहीं पड़ती है। ब्रह्मा-शंकर आदि श्रीकृष्ण के वश में हैं। सम्पूर्ण जगत् उनके वश में है।  उन्होंने स्वयं ही यह प्रकट किया कि मैं भक्तों के वश में हूँ। सर्वत्र स्वतंत्र, भक्तों के परतंत्र। श्रीवत्सांक मिश्र ने कहा है – अनन्याधीनत्वं तव किल जगुर्वैदिकगिरः पराधीनं त्वां तु प्रणतपरतंत्रं मनुमहे। वेदवाणी आपको अनन्याधीन=किसी के आधीन नहीं कहती है परन्तु हम तो प्रणत- परतंत्र आपको पराधीन ही मानते हैं। अनन्य भक्तों के अधीन – वेदवाणी का ऐसा अभिप्राय है।

(क्रमशः)

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