उलूखल बन्धन लीला-24

     आचार्य वल्लभ का कथन है कि भगवान् ने अपने में दो दोष दिखाये- पहला उसका पुत्र होना और दूसरा अपराधी होना। दो अंगुल न्यून होकर रस्सी कहती है कि ये दोनों दोष श्रीकृष्ण में नहीं हैं। माता को आश्चर्य भी होता है परन्तु श्रीकृष्ण की इच्छा अपनी व्यापकता के प्रदर्शन की भी है। पेट बढ़ता नहीं है, कमर मोटी होती नहीं है, रस्सी पर रस्सी जोड़ने पर भी दो ही अंगुल कम होती है। देवता तीन बार अपना सत्य प्रकट करता है। अतएव तीन बार न्यूनता हुई। गोपियाँ हँसती थीं। उन्हें लीला-दर्शन का आनन्द आता था। गोपियों ने यशोदा माता से कहा – ‘अरी, यशोदा !पतली-सी कमर में रुन-झुन-रुन-झुन करके छोटी-सी करधनी बँधी हुई है और घर की सारी रस्सियों से यह नटखट बँधता नहीं है। यह बड़े मंगल की सूचना है कि विधाता ने इसके ललाट में बन्धन योग नहीं लिखा है। अब तू छोड़ दे यह उद्योग।’ परन्तु यशोदा माता ने कहा – ‘भले ही बाँधते-बाँधते संध्या हो जाय, गाँव की सारी रस्सियाँ लग जायँ, मैं आज बाँधे बिना नहीं मानूँगी।’ कृष्ण का हठ है- मैं नहीं बंधूँगा। माता का हठ है मैं बाँधूंगी। यह निश्चय है कि भक्त का हठ विजयी होगा। भगवान् ने अपना आग्रह छोड़ दिया। बात यह है कि भगवान् में असंगता, विभुता आदि अनेक शक्तियाँ हैं परन्तु परम भास्वती भगवती कृपाशक्ति ही सर्वशक्ति चक्रवर्तिनी हैं। वे भगवान् के मनको नवनीत के समान पिघला देती हैं और असंगता, सत्य-संकल्पता, विभुता को छिपा देती हैं। दो अंगुल की न्यूनता का अभिप्राय यह है कि जब तक  भक्त में भजनजन्य श्रान्ति का उदय नहीं होता तब तक वे भक्त के वश में नहीं होते। जब दोनों एकत्र हो गये तब भगवान् बँध गये यह श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती का भाव है।

     श्री वल्लभाचार्य कहते हैं कि माता का शरीर स्वेद से भींग गया। उसकी केशों में लगी मालाएँ बिखर गयीं। वह थक गयी। पुत्र का कर्तव्य है कि माता का परितोष करे। श्रुति है – ‘मातृदेवो भव।’ स्मृति है – ‘माता सबसे बड़ी है।’ अतः उसको थकाना उचित नहीं है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि ‘इसके कोई दूसरा पुत्र भी नहीं है जो इसका दुःख दूर करे। मैंने ही इसे अपनी माता बनाया है। मैं गोकुल का दुःख दूर करने के लिए प्रकट हुआ और माता का दुःख दूर न करूँ, तो क्या ठीक होगा ? सौभाग्य-दान के लिए आया और इसके अलंकारों का तिरस्कार कर दूँ ?’ जो भक्तों के दूरस्थ दुःख को भी नहीं देख सकते, वे अपने सम्मुख माता के दुःख को कैसे देख सकते हैं ? अतएव कृपानुग्रह से श्रीकृष्ण ने बन्धन स्वीकार कर लिया। कृपा सब धर्म और धर्मियों से बलवती है। भगवान् अपनी कृपा से ही सबसे बँधते हैं।  

    (क्रमशः) 

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