उलूखल बन्धन लीला-22

     अब बन्धन – साधनस्वरूप पर विचार कीजिये। रज्जु आदि के पूर्वापर भाग में यही विद्यमान हैं। स्वयं यशोदा इस सम्बन्ध में प्रमाण हैं कि उन्होंने भगवान् के मुख में सम्पूर्ण विश्व देख लिया था। वे सबके बाहर और भीतर हैं। न केवल वे जगत् हैं, जगच्चय (जगतां चयः) हैं। जहाँ तक जगत् की गति है भगवान् उतने ही नहीं हैं। क्या जगत् जगदात्मा को बाँध सकता है। स्वयं स्व को नहीं बाँधता। किसी भी प्रकार से भगवान् में बन्धन नहीं है, यह सोचकर भक्त निश्चिन्त रहते हैं। परन्तु इस रूप में लोग भगवान् को नहीं जानते। यदि वह अपने को सर्वथा गुप्त ही रखे तो उसका स्वरुप किसी को ज्ञात नहीं होगा। अतः भगवान् स्वयं अपने परस्पर-विरुद्ध धर्मों का बोधन कराते हैं ; क्योंकि दूसरों के समझाने पर भी सन्देह की पूर्ण निवृत्ति नहीं होती। मर्मज्ञ पुरुष अन्याभिनय-परायण नट के वास्तविक स्वरुप को पहचान लेते हैं। परन्तु यह अधोक्षज (अधः अक्षजं ज्ञानं यस्मात्) प्रत्यक्षादि-जन्य ज्ञान जिसका स्पर्श नहीं कर सकते हैं। जबतक यह स्वयं अपनी पहचान स्वयं न करावें, क्या हो सकता है ? अतः बद्ध-मुक्त सब यही हैं – यह प्रकट करने के लिए बन्धन-लीला है।

     यशोदा माता ने ऊखल में क्यों बाँधा ? इसपर हरिसूरि की उत्प्रेक्षा सुनिए- नामैकदेशग्रहण-न्याय से उलूखल खल है। खल-संग छुड़ाने के लिए उसका अति संग  ही कारण बन जाता है। अत्यन्त सान्निध्य से अवज्ञा का उदय होता है। इस नीति के अनुसार ही यशोदा ने उलूखल में बाँधा।

परिहातुं खलसङ्गममतितरखलसङ्ग  एव हेतुरिति।

अतिसन्निकर्षशास्त्राज्ज्ञानत्येषा बबन्ध किमु तस्मिन्।।

     यशोदा मैया ने सोचा कि उलूखल भी चोर है; क्योंकि माखनचोरी करते समय इसने कृष्ण की सहायता की थी। चोर का साथी चोर। इसलिए दोनों बन्धन के योग्य हैं।

अयं चौरश्चौर्यकर्मण्येतत्साहाय्यभागभूत्।

इति वीक्ष्य द्वयोर्बन्धार्हतां तत्र बबन्ध तम्।।

(क्रमशः)

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