उलूखल बन्धन लीला-20

     माता के मन में भगवान् श्रीकृष्ण को बाँधने की इच्छा उदित हुई। ऐसा क्यों हुआ ? भगवान् के स्वरुप में बन्धन नहीं है। क्या यशोदा भगवान् के इस सामर्थ्य से अपरिचित है ? शुकदेवजी कहते हैं  कि ‘हाँ अपरिचित है।’ तब क्या पूतना, तृणावर्त आदि के वध का ऐश्वर्य, वीर्य देखकर भी न पहचान सकी ? यही प्रेम का सामर्थ्य है।’ वह प्रियतम के माधुर्य को पहचानता है,ऐश्वर्य को नहीं। मूल में कहा है कि भगवान् में भीतर-बाहर, पूर्वापरका भेद नहीं है। वही बाह्याभ्यन्तर, पूर्वापर एवं जगत् भी हैं। वे अजन्मा और अव्यक्त हैं। इन्द्रियातीत हैं। फिर भी मनुष्यरूप में प्रकट कृष्ण को गोपी ने रस्सी से ऊखल में बाँध दिया मानो, कोई प्राकृत शिशु हो।

     श्रीधर स्वामी ने कहा है- बन्धन तो तब हो जिसको बाहर से चारों ओर से लपेटा जा सके और वह रस्सी के घेरे में आ जाये। एक ओर से रस्सी पकड़े और दूसरी ओर से मिला दें। यहाँ भगवान् सर्वथा उसके विपरीत हैं। व्याप्य व्यापक को बाँध नहीं सकता और फिर दूसरा कोई हो तो बाँधे। जब भगवान् के अतिरक्त और कुछ है ही नहीं तो कौन किसको बाँधे ? फिर भी यशोदा ने मनुष्य-रूप में प्रकाशमान इन्द्रियातीत को अपना पुत्र मानकर बाँध लिया।

     श्री जीवगोस्वामी का अभिप्राय है कि श्रीकृष्ण व्यापक हैं इसलिए उनके बाहर कुछ नहीं है। बाहर के प्रतियोगी के रूप में प्रतीयमान अन्तर भी नहीं है। पूर्वापर की भी यही दशा है। वही जगत् है अर्थात् कारण से अतिरिक्त कार्य नहीं होता। देश-काल-वस्तु वही हैं। उनकी शक्ति से ही जगत् की शक्ति है। ऐसी अवस्था में उनकी शक्ति का एक क्षुद्र अंश रस्सी उन्हें कैसे बाँध सकती है ?क्या स्फुल्लिंग (चिनगारी) अग्नि को जला सकते हैं ? परन्तु यशोदा माता ने कृष्ण को बाँध लिया। वे अधोक्षज (इन्द्रियातीत ) होने के साथ-ही-साथ  मनुष्य-वेषधारी भी हैं। ‘नारायणाध्यात्मम्’ में कहा गया है कि ‘अव्यक्त भगवान् अपनी शक्ति से ही दर्शन के विषय होते हैं। उन्हें दूसरा कोई अपनी शक्ति से नहीं देख सकता।’ श्रुति में कहा है – देवता और इन्द्रिय उसके बनाये हुए उत्पन्न हैं। वे अपने  पूर्ववर्ती अनुत्पन्न कारण को नहीं जान सकते।’ मध्वाचार्य भगवान् को अस्थूल-स्थूल, अनणु-अणु एवं अवर्ण-श्यामवर्ण कहा है। अर्थात् उनमें परस्पर विरोधी धर्म हैं। श्री नृसिंहतापिनी श्रुति कण्ठतः घोषणा करती है-

तुरीयमतुरीयमात्मानमनात्मान मुग्रमनुग्रं वीरमवीरं महान्तम-

महान्तं विष्णुमविष्णुं ज्वलन्तमज्वलन्तं सर्वतोमुखम सर्वतोमुखम्

     तुरीय-अतुरीय, आत्मा-अनात्मा, उग्र-अनुग्र, वीर-अवीर, महान्-अल्प, विष्णु-अविष्णु, प्रदीप्त-शान्त, व्यापक-अव्यापक सब भगवान् ही हैं। गीता में ‘मत्स्थानि’ एवं ‘न च मत्स्थानि’ एक साथ ही हैं। वे विरुद्ध-अविरुद्ध अनन्त शक्तियों के निधान हैं और उनकी प्रत्येक शक्ति अचिन्त्य है। अतः बन्धन की असम्भावना और सम्भावना दोनों ही उनमें युक्ति-युक्त हैं। दोनों एक साथ ही संगत हैं।

(क्रमशः)

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