उलूखल बन्धन लीला-12

  माता के चले जाने पर श्रीकृष्ण के मन में कोप का संचार हुआ। प्रलय के समय ईश्वर के कोप से ही संहार-क्रिया होती है। अतः ईश्वर के साथ कोप का मेल नहीं है- यह सोचना असंगत है।  माता छोड़ कर चली जाय और बालक असंग-उदासीन रहे, उपेक्षा कर दे तो उसके हृदय में माता के प्रति प्रेम की न्यूनता है। शिशु अपना है तो माता भी अपनी है, वह क्यों चली जाय ? आचार्य वल्लभ का कहना है कि श्रीकृष्ण के हृदय में बहुत से बालक विद्यमान हैं। उनकी रक्षा एवं संवर्धन के लिए वे उन्हें पुष्टि दे रहे थे। भक्ति-मार्ग के अनुसार माता के द्वारा उसमें बाधा डाली गयी। अतएव कोप का उदय हुआ। कोप के अनुभाव प्रकट हुए। होठ लाल-लाल होकर फड़कने लगे। लाल-लाल होना रजोगुण है और फड़कना कुछ बोलने के लिए उद्वेग है। कोप और यशोदा के बीच में भगवान् के अधर में स्थित लोभ प्रकट हो गया। मानो,कह रहा हो, दोष माता का नहीं, मेरा है। आप में अतृप्ति=लोभ है और माता में दूध की रक्षा का लोभ है। आप मुझे दण्ड दीजिये, माता को नहीं। कृष्ण ने दोनों के लिए दण्ड-विधान किया। रक्तवर्ण रजोगुण को श्वेतवर्ण सत्त्वगुण-रूप दाँतों से दबा दिया। श्वेतिमा सात्त्विक ब्राह्मण है। रक्तिमा राजस क्षत्रिय है। दाँत द्विज हैं। सत्त्वगुण के द्वारा रजोगुण को अथवा ब्राह्मण के द्वारा क्षत्रिय को शिक्षा दी गयी। माता के लिए भी दण्ड-विधान हुआ । शैशव में ऐसा होता है। दूध के लोभ से मुझे छोड़ कर गयी तो दूध-दही की और भी हानि उठानी पड़ी। यज्ञायुध (दृषदशमा ) लोढ़े से भागवत-यज्ञ में बाधक भाण्डासुर को भग्न कर दिया।  

(क्रमशः) 

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