उलूखल बन्धन-लीला-10

     वह अधिक तपस्या करके अपने पूर्ण परिपाक की प्रतीक्षा करने लगा। भगवान् के सम्मुख या भागवत का दृष्टिपात होने पर प्रतीक्षा की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। भगवान् किसी की परीक्षा नहीं लेते: क्योंकि वे सर्वज्ञ हैं। जो न जानता हो वह परीक्षा करके जाने। वे जैसे अपने को अभिव्यक्ति देकर भक्तों में प्रकट होते हैं, वैसे ही भक्तों के भाव को अभिव्यक्ति देकर साधकों के लिए आदर्श व्यञ्जना करते हैं। अब भगवान् के मन में विचार-परम्परा का समुदय हुआ। माँ भक्त को बचाने के लिए दौड़ी, यह ठीक है परन्तु मुझे छोड़कर क्यों गयी ? बड़े=बड़े ऋषि-मुनि सोऽहं भावना के द्वारा भी मुझे प्राप्त नहीं कर सकते। वही मैं इसका भाव देखकर शिशु बना। यह दूध के लिए मुझे छोड़ कर जाती है। अवश्य क्रोध करना चाहिए। अभिप्राय यह है कि यशोदा श्रीकृष्ण को छोड़ कर चली जायँ और श्रीकृष्ण चुपचाप पड़े रहें तो मातृ-स्नेह की अभिव्यक्ति नहीं हुई और यदि श्री कृष्ण कुछ उपद्रव करें तथा माता उसके लिए शिक्षा-दण्ड का प्रयोग न करे तो पुत्र-स्नेह की अभिव्यक्ति नहीं हुई। स्नेह एक भाव है  और वह वस्तु, क्रिया अथवा शब्द के वाहन पर आरूढ़ होकर व्यवहार में उतरता है। निष्क्रियता में केवल असङ्गता ही अभिव्यञ्जित होती है। वह लीला-रस नहीं है। स्नेह के प्रवाह में बाधा पड़ने पर कोप का जन्म हुआ। 

     यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि सबसे प्रथम श्रीकृष्ण के मन में स्तन्यपान की कामना अवतीर्ण हुई। कामना के बाद स्तन्य का भोग हुआ। भोग में अतृप्ति हुई – यह लोभ है। लोभ के प्रतिहत होने पर कोप का उदय हुआ। भांड-भञ्जन की क्रिया=हिंसा आयी। झूठे आँसू = दम्भ का आना रोदनात्मक रुद्र के आगमन की सूचना है। बासी माखनकी चोरी तृष्णाधिक्य है। भय, पलायन और बन्धन उसके उत्तर भावी परिणाम हैं। कामना से बन्धन-पर्यन्त ईश्वर की लीला है। जीव के लिए सावधान रहने की प्रेरणा है। भगवान् सर्वात्मक हैं। वे स्तेनों और तस्करों के भी पति हैं। स्त्री-पुरुष, कुमारी-कुमार, युवा-वृद्ध सब उनका स्वरुप है। जो उनको पहचान लेता है वह सब भावों में सब रूपों में उनका दर्शन करता है। अच्छा, तो अब इस लीला में प्रवेश किया जाय।  

(क्रमशः)

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