उलूखल बन्धन-लीला-8

     श्री जीवगोस्वामी के मत में उलूखल बन्धन-लीला पूर्वलीला एवं उत्तरलीला से विलक्षण है। मृद्भक्षण एवं ग्वालिनों की ताली के साथ नृत्य से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। परन्तु श्रीधर स्वामी ने इस लीला की यह संगति लगाई है कि मुख में विश्वदर्शन से माता के मन में जो विस्मय का उदय हुआ था, उसकी शान्ति के लिए प्रत्येक रस्सी दो अंगुल न्यून है, यह दिखा कर अपनी पूर्णता अभिव्यक्त कर दी गयी। श्री भक्त रसायनकार भक्त कवि श्री हरिसूरि ने यह कहा है कि मुख में नामरूपात्मक प्रपञ्च का दर्शन हो जाने पर भगवत्सेवा के कार्य में भक्त की प्रवृत्ति स्वाभाविक है। जो कर्मानुष्ठान के समय भी भगवत्स्मरण करता है उसे भगवान् सुलभ होते हैं। माता के वस्त्राभूषण के वर्णन से यह सिद्ध होता है कि जो भगवान् का श्रवण-वर्णन, ध्यान-गान सेवा-स्नेह में संलग्न है उसको संसार त्याग की आवश्यकता नहीं है। वह अपने विहित सांसारिक विषय-भोगों के साथ भी भगवान् को प्राप्त कर सकता है। भगवान् हृदय के स्तन द्वारा छलकते हुए रस को देखते हैं और उसका पान करना चाहते हैं। बाह्य नैवेद्य- नवनीत की ओर नहीं देखते। भक्ति की पूर्णता में कर्मत्याग का प्रत्यवाय नहीं है। जब अमृतस्वरूप ‘मैं’ प्राप्त हो गया तो भूसी कूटने से क्या लाभ ? यशोदा ने सारे कर्म छोड़ दिये। वे स्मित-सुन्दर मुख का पान करने लगीं और श्रीकृष्ण दूध का।

     शिशु का नैसर्गिक पेय है माता का स्तन्य। वह भगवद्भोग्य श्रीकृष्ण पेय-पय  हो चुका है। अब प्रश्न है- दूसरों के पय को भगवद्भोग्य बनाने का। यह भी महापुरुष ही कर सकते हैं। अतएव मन्थस्थान के बाह्य देश में परिपक्व होने के लिए अग्नि पर गाय का दूध चढ़ाया गया है। अग्निताप से उसमें उत्सेक (उफान)आया। भागवत हृदय का स्वभाव यह है कि आत्मसुख का सङ्कोच अथवा परित्याग करके भी अन्यसुख को समृद्ध करें। इस प्रसङ्ग में माता ने आत्मसुख का ही नहीं, भगवत्सुख में भी बाधा डाली। वह श्री कृष्ण को छोड़ कर वेग से जलते दूध को सम्भालने के लिए दौड़ पड़ी। दूध में उफान क्यों आया ? मन्थनानुरोध का परित्याग करके भगवद् अनुरोध के अनुसार दुग्धाप्यायन में प्रवृत्त यशोदा उसकी उपेक्षा करके दुग्ध-रक्षण में क्यों प्रवृत्त हुई ? 

(क्रमशः)

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