उलूखल बन्धन-लीला-6

      माता दधिमंथन कर रही है। उसके मन में लालसा है कि लाल के शयन से उठने के पूर्व सद्-माखन  (सद्योनवनीत) निकाल लूँ परन्तु मंथन करे कृष्ण को खिलाने के लिए, लालसा करे और वे सोते रहें –  यह भगवत्स्वरूप के अनुरूप नहीं है – ‘तांस्तथैव भजाम्यहम्’ इस स्वभाव के अनुगुण ही कुछ करना चाहिए। माँ का स्नेह देख कर कृष्ण का हृदय स्नेह से भर गया। हृदय द्रवित हुआ। शरीर में रोमाञ्च, मुख पर मुस्कान, नेत्रों में चमक, साथ ही माँ के पास पहुँच जाने की ललक। अंगड़ाई ली,हाथों से नेत्र मल लिए, कपोलों पर कज्जल फ़ैल गया। माँ-माँ बोले, पलंग पर पाँव लटकाकर बैठ गये। बिना हाथ-मुँह धोये माँ के पास पहुँच कर पल्ला पकड़ लिया-ऊँ-ऊँ, मैं दूध पीऊँगा। माँ मन्थन में लगी रही। शिशु अपना।  दूध छाती में। मक्खन आने ही वाला है, कहीं बैठ न जाय। ध्यान नहीं दिया। शिशु-ब्रह्म धरती में लोट-पोट होने लगा, रोने लगा। फिर भी ध्यान न देने पर रयि (मथानी) पकड़कर मन्थन का निषेध कर दिया। सारे कर्म, सभी साधन तभी तक हैं जबतक परमेश्वर न मिले। वह नवनीतों का नवनीत श्याम ब्रह्म आ गया तो मन्थन से क्या लाभ? प्रयोजन-पूर्ति से साधन का बाध हो जाता है। नदी के पार पहुँच गये, अब नाव का क्या प्रयोजन ? यशोदा माता ने उपनिषत्सुधाब्धि में आहिण्डन करने वाली विवेक की मथानी मानो छोड़ दी। अपने हृदय से लगे शिशुब्रह्म को दूध पिलाने लगी। 

     आचार्य वल्लभ इस प्रसङ्ग का रसास्वादन करते हुए कहते हैं कि ऊखल-बन्धन अत्यंत विस्मयकारी चरित्र भक्ति को निश्चल करने के लिये है। इसके द्वारा भगवान् के स्वरूप, कृपालु स्वभाव  और दया मिश्रित ज्ञान की अभिव्यक्ति होती है। यदि भक्तों का भगवान् में और भगवान् का भक्तों में परस्पर निरोध हो जाय तो उभयसम्बन्ध से दृढ़ हो जाता है। जीव का ज्ञान-वैराग्य और भगवान् का अनुग्रह – इन्हीं से भगवान् का वशीकार सिद्ध होता है। भक्ति नवधा प्रसिद्ध है। दसवीं गुणातीत है। अथवा नौ अंग हैं और उनमें अनुगत दसवीं भक्ति स्नेह है। अतः इसमें कर्मकाण्ड  और ज्ञानकाण्ड दोनों का समावेश हो जाता है। जीव जब ईश्वर से प्रेम करने लगता है तब एकबार भगवान् भागते हैं। इससे आसक्ति और दृढ़ हो जाती है।

(क्रमशः)  

 

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