उलूखल बन्धन-लीला-5

     भक्तमाता यशोदा का दर्शन कीजिये। वह समग्र यश के निधान भगवान् श्री कृष्ण को सतृष्ण बना कर अपना स्नेहसार आस्वादन करने के लिये उत्सुक बना देती है। उसमें ऐसा क्या विशेष है ? देखिये, स्वयं आनन्द-गेहिनी नन्दगेहिनी है परन्तु अपने शिशु के प्रति इतना प्रेम है कि जान-बूझ कर गृहदासियों को दूसरे कर्मों में लगा देती है। अपने हाथों से श्रीकृष्ण के लिए विशेष रूपसे निश्चित पद्मगन्धा  गाय के दूध से जमे दही का मंथन करती है। माँ अपने हृत्पिण्ड वात्सलयभाजन शिशु के लिए अपने हृदय का स्नेह तो देती ही है, उसका मूर्तरूप दूध भी पिलाती है। यदि नवनीत खिलाना हो तो दूसरे के हाथ का निकाला हुआ नहीं, अपने हाथ का निकाला हुआ हो। माता माने मूर्तिमान् स्नेह। माता के अतिरिक्त और किसी के हृदय का भाव शिशु के लिए ठोस वस्तु का रूप (जैसे दूध)ग्रहण नहीं करता। माता यशोदा का कर्म दधिमन्थन कृष्ण के लिए है। उसके हृदय में स्मरण कृष्ण की बाल लीलाओं का है। स्मरण संगीत की रसमयी धारा के रूप में वाणी से मूर्छित हो रहा है। कर्म, मन और वाणी तीनों कृष्ण के लिए। भक्ति का यही स्वरुप है। कर्म में उद्देश्य भगवान् का हो अर्थात् उसके लिए किया जा रहा हो। स्मरण का विषय भगवान् हो।  वाणी के शब्द भगवत्सम्बन्धी हों। यह मूर्तिमती भक्ति है। इसे अपने शरीर और शृङ्गार का विस्मरण है। स्वेद झलकता है मुख पर। मालती के पुष्प सिर से झड़ कर पाँव में गिरते हैं। शुकदेव जी इसकी झाँकी का दर्शन करते हैं। सच-मुच यह भक्तिमाता ही यश के निधान भगवान् मेंअविद्यमान यश का दान करती है।भगवान् स्वतंत्र हैं वे भक्त के परतंत्र हो जाते हैं, ऐसा यंत्र-मन्त्रभक्तिमाता के जीवन में ही होता है।माता न होती तो भक्तवश्यता का यश कहाँ से मिलता ? 

(क्रमशः)

 

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