उलूखल बन्धन-लीला-1

     

     प्रपंच का विस्मरण और भगवान् में तन्मयता यही लीला का प्रयोजन है। यह प्रपंच का लय करती है और भगवान् में लीन करती है। जहाँ स्वयं भगवान् ही लीलानायक हों, उस लीला की पूर्णता में कोई संदेह नहीं हो सकता। वहाँ प्रपञ्च का विस्मरण हो जाय, भगवान् की भगवत्ता भी भूल जाय, हम उनकी लीला में तन्मय हो जायें, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। यहाँ हम इतना स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि भगवान् की लीला के प्रतीकार्थ निकाले जा सकते हैं परन्तु वस्तुतः भगवान् की लीला प्रतीक नहीं होती। निराकार का साकार प्रतीक होता है। परोक्ष का प्रत्यक्ष प्रतीक होता है। अज्ञात का ज्ञात प्रतीक होता है। परन्तु जो सर्वात्मा, सर्व-स्वरुप है वह लीलाधारी और लीला भी है। अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है। सुनार भी वही, सोना भी वही। अतएव भगवान् की लीला भगवत्स्वरूप ही होती है और उसमें तन्मयता भगवत्स्वरूपापत्ति ही होती है। उस रस-कल्लोल में उन्मज्जन-निमज्जन के अतिरिक्त उसका कोई अन्य प्रयोजन या फल नहीं होता। भगवान् स्वयं सब फलों के फल हैं। उनकी लीला भी वैसी ही है। वह गौण हो और उसका फलितार्थ मुख्य- यह कल्पना ठीक नहीं है। उल्लसित रस का ही नाम लीला है। यह भगवन्मय-भगवद्विलास है। अविद्या मूलक बंधन की निवृत्ति के अनन्तर ही इसका यथार्थ अनुभव होता है।  

(क्रमशः)

 

 

 

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