धर्म-प्रेरणा के स्रोत-(5)

     क्या आप ऐन्द्रियक ज्ञान एवं मानसिक संवेदनोंसे अपने चित्त में जो अनुभव-संस्कार एकत्र करते हैं और उनके आधार पर जो अनुमानाभास  और उनके बच्चे-कच्चे वंश-वृद्धि करते हैं, वे धर्म का साक्षात्कार करने के लिए पर्याप्त प्रामाणिक हैं ? यदि धर्म का लौकिक प्रत्यक्ष हो जाता और उसके आधार पर होनेवाले अनुमान, उपमान, अर्थापत्ति  अथवा अनुपलब्धि के द्वारा हम उसको देख पाते तो क्या सृष्टि में धर्म के सम्बन्ध में इतने मतभेद और संघर्षों की सृष्टि हो पाती ? श्रम वस्तुशोधन के लिए होता है। धर्म अधिकारी शोधन के लिए होता है। जड़ता की प्रधानता से श्रम और चैतन्य की ओर उन्मुखता से धर्म। प्रत्यक्षादि प्रमाण बाह्यदर्शी होते हैं। धर्म अन्तरंग वस्तु है। वह अंतःकरण को दोषमुक्त  और अंतर्मुख करता है। आत्मा अथवा परमात्मा में स्थित करानेवाला परमधर्म है- योग अथवा भक्ति। परन्तु आत्मा-परमात्मा के ऐक्य का बोध किसी धर्म का परिणाम नहीं है। धर्म-संस्कार के द्वारा केवल  विकार की निवृत्ति-मात्र होती है। ऐक्य का बोध तो चरम एवं परम प्रमाण का विषय है। ऐसी स्थिति में यदि आप ऐन्द्रियक अथवा मानसिक संवेदनों को प्रेरक मानकर धर्म का निर्णय करते हैं  तो क्या आप सच्चे धर्मका निर्णय कर सकेंगे ? क्या आपके इन्द्रिय और मन प्राकृत विकार एवं संकीर्ण संस्कार से मुक्त हैं ?

                                                                                                                                 (क्रमशः)

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