धर्म-प्रेरणा के स्रोत-(4)

        क्या आप वस्तु के गुणावगुण और क्रिया कलाप के द्वारा  निष्पन्न होने वाले परिणामों पर अन्वय-व्यतिरेक की दृष्टि से विवेक  करके धर्माधर्म का निर्णय करते हैं ? द्रव्य के गुणावगुण विवेक केवल साधारण दृष्टि से रासायनिक प्रक्रिया के द्वारा नहीं किया जा सकता। उसके लिए देश,काल, जाति, व्यक्ति, मान्यता, अवस्था, स्थिति, शक्ति, वय आदि का सम्पूर्ण ज्ञान अपेक्षित होता है। कब, कहाँ, किसके लिए, किस परिस्थिति में क्या हितकारी है ? यह सर्वज्ञ ईश्वर के अतिरिक्त और कौन जान सकता है ? रही बात क्रिया-कलापकी, सो समग्र मानव-जाति के लिए सर्वकालिक एवं सार्वभौम उदार दृष्टि से विचार करने का दावा कौन कर सकता है ? अनुदीर्ण और संकीर्ण  दृष्टि होनेपर अपने ग्रन्थ और पन्थ  का बोल-बाला  हो जाता है और अपनी डफली और अपना राग बजने लगता है। द्रव्य के गुणानुवाद और क्रिया-कलाप के परिणामों का लौकिक सम्बन्ध यथाकथंचित् ज्ञात भी हो जाये तो पारलौकिक सम्बन्ध ज्ञात करनेका कोई उपाय नहीं है। इसलिए यदि आप केवल अपनी बुद्धि और विवेक के द्वारा धर्म की प्रेरणा प्राप्त करते हैं तो आप पुनर्विचार कीजिये – आपका युक्तिवाद भुक्ति का हेतु हो सकता है, मुक्ति का नहीं। क्या बालक, वृद्ध और मूर्खजन भी इस युक्तिसे धर्म-प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं ? यदि नहीं, तो  धर्म के उद्गम-स्थान को और भी गहराई में ढूँढना आवश्यक है। धर्म के प्रेरक तत्त्व इतने उथले स्तर पर नहीं रहा करते।  

                                                                                                                                        (क्रमशः)

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