धर्म-प्रेरणा के स्रोत-(1)

       जैसे वायु का धर्म गति और अग्नि का धर्म दाह है, वैसे ही मनुष्य धर्म मनुष्यत्व है। मनुष्य-शरीर में मज्जागत एक विशेषता है, रक्तगत एक वीर्यवत्ता है, चित्तगत एक संस्कार है, बुद्धिगत एक विचारधारा है, स्वभावगत एक रसप्रवाह है, आत्मगत एक अनुवृत्ति-व्यावृत्ति का बोध है। वस्तुतः मनुष्य धर्म छोड़ कर जीवित नहीं रह सकता। भिन्न-भिन्न वस्तुओं के चिन्तन में लगे रहने के कारण मनुष्य आत्म-निरीक्षण नहीं कर पाता। आप थोड़ी देर के लिए स्वस्थचित्त से अपने धर्म के सम्बन्ध में चिन्तन कीजिये। आपको धर्म-प्रेरणा कहाँ से प्राप्त होती है ?

        क्या आपको ऐसा प्रतीत होता है कि ईश्वर धर्म के लिए प्रेरित करता है ? वह प्रेरणा किस प्रकार की होती है ? क्या उसका रूप कुछ ऐसा होता है कि तुम अपने मन एवं इंद्रिय को इस कर्म से, भोग से, संग्रह से और भाषण से अलग रखो ? इस निषेधात्मक प्रेरणा का बड़ा महत्त्व  है। आप इस पर गंभीरता से ध्यान दीजिये। अथवा ईश्वर से इस प्रकार की प्रेरणा मिलती है कि इस  प्रकार का कर्म, भोग, संग्रह और भाषण करो ? प्रवर्तक प्रेरणा में धर्म को पहचानना कठिन है। क्या आप अज्ञानियों को ज्ञान, कंगालों को अन्न-वस्त्र, रोगियों को औषध देने की प्रेरणा ग्रहण करके उसके अनुसार आचरण ग्रहण करते हैं ?

 

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