ध्यान का रहस्य- (3)

      दैहिक जीवन की दृष्टि से ही अंतःकरण, बहिःकरण का भेद होता है। तात्त्विक जीवन में इनका कोई सत्त्व-महत्त्व नहीं है।  संस्क्रिया चित्त, विक्रिया मन, अहंक्रिया अहंकार और प्रक्रिया का नाम बुद्धि है। इनको क्रम से खजाना, सङ्कल्प, मैं-पना  और निश्चय भी कह सकते हैं। यह समूचा अतःकरण के नाम से प्रसिद्ध है  जब आप परमार्थ का कोई आकार मन में बनाते हैं, बुद्धि में उसका निश्चय करते हैं, वह मैं ही हूँ- ऐसा सोचते हैं या शान्त होकर बैठ जाते हैं तो ये चारों स्थितियाँ अंतःकरण की ही होती हैं। ये चेतन से प्रकाशित हैं अर्थात् आप इसके द्रष्टा-साक्षी हैं। आपको द्रष्टा-साक्षी बनना नहीं है, होना भी नहीं है, केवल समझ लेना है कि आप असङ्ग -उदासीन  कूटस्थ-तटस्थ हैं। न आपको अन्तर में घुसना है, न थोड़ी देर के लिए निष्क्रिय होना है, न दृश्य को देखने लगना है। यह सब अन्तर, थोड़ी देर और दृश्य तो आपकी दृष्टि की चमक है। आप देखिये, कोई वस्तु ही नहीं है, दृष्टि ही है। जिस अंतःकरण के पेट में सब कुछ प्रतीत होता है  उसमें तो संस्कार-युक्त ज्ञान-रश्मियों के अतिरिक्त और कोई पदार्थ ही नहीं है। वह अंतःकरण-रूप फिल्म आपमें आपसे ही प्रकाशित है। वस्तुतः आप ही हैं। अंतःकरण और अन्तःकरणस्थ ईश्वर, जीव एवं देश-काल-द्रव्यात्मक जगत् बिना हुए ही भास रहे हैं। गम्भीरता से देखने पर फिल्म बिखर जाएगी, केवल चेतन रहेगा, क्योंकि वह चेतन के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। अंतःकरण की फिल्में ही देश-काल-वस्तु सब हैं, चेतन में नहीं। आप स्वयं अखण्ड चेतन हैं।   

                                                                                                                                             (क्रमशः)

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