ध्यान का रहस्य- (2)

       

           आप किसी एक इन्द्रिय पर  अथवा सब इन्द्रियों  पर ध्यान दीजिये।  एक ज्ञान है जो स्थानभेद से भिन्न-भिन्न  विषयों को ग्रहण करता है। सभी गोलक स्थानीय हैं  और वहां वासना-विशेष से वासित ज्ञान ही इंद्रियों का काम कर रहा है। गन्ध-वासना, रस-वासना, रूप-वासना आदि वासनाओं के पृथक्-पृथक् होने पर भी ज्ञान एक ही है। शीशे के रंग अलग-अलग, रोशनी एक। आप किसी भी वासना के साथ प्रयोग करके देख लीजिये। वासनाओं का उदय-विलय होता है। वे अलग-अलग होती हैं। ज्ञान एक है। किसी वासना को भी इतने गौर से देखिये कि उसमें ज्ञान ही ज्ञान दिखे, ज्ञान से अलग वासना न दिखे। दक्षिणाक्षि में पुरुष का दर्शन कीजिये अर्थात् इन्द्रिय-गोलक मत देखिए, तदुपाधिक ज्ञान देखिये। गोलक, वासना, वृत्ति-यह सब ज्ञानमात्र ही हैं। सभी इंद्रियों की यही दशा है। वे ज्ञानमात्र हैं। आप ज्ञानमात्र हैं। इंद्रियों का अलग-अलग दीखना बंद। केवल आप। ध्यान-काल में ही नहीं, व्यवहार-काल में भी आप ही।  तत्तत् इन्द्रियों और उनके विषयों के रूप में भास रहे हैं।   

(क्रमशः)

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