पूज्यपाद महाराजश्री से वार्तालाप-2

     प्रश्न – तब क्या भेद के प्रतिपादन से  किसी प्रयोजन की सिद्धि नहीं होती ?

    उत्तर – भेद के प्रतिपादन से अर्थ, धर्म,काम रूप तीनों पुरुषार्थों की सिद्धि होती है, परन्तु मुक्ति की सिद्धि नहीं होती। भेद में परिच्छिन्नता की भ्रान्ति दुःख है, अहंकार दुःख है, राग-द्वेष दुःख है और जन्म-मरण भी दुःख है। भेद में समाधि-विक्षेप नहीं छूटते, सुख-दुःख नहीं छूटते, पाप-पुण्य नहीं छूटते  और संयोग-वियोग भी नहीं छूटते; इसलिए भेद में जन्म-मरण का चक्र अव्याहत रूप से चलता रहता है। इसलिए मुक्ति पुरुषार्थ की सिद्धि भेद से नहीं हो सकती। मुक्ति स्वयं आत्मा का स्वरुप ही है। ज्ञान रूप से उपलक्षित आत्मा ही अज्ञान की निवृत्ति है।  निवृत्ति कोई स्वतंत्र पदार्थ नहीं है। इसलिए मुक्ति में प्राप्य-प्रापक, साध्य-साधन आदि भाव भी नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि श्रुति का तत्पर्य भेद के प्रतिपादन में नहीं है, क्योंकि भेद की सिद्धि से मुक्ति की सिद्धि नहीं हो सकती।

     प्रश्न – फिर भेद प्रतिपादक श्रुतियों का क्या होगा ?

     उत्तर – भेद प्रतिपादक श्रुतियां अविरक्त अधिकारी के लिए हैं। उनसे लौकिक-पारलौकिक सिद्धि की प्राप्ति होती है, व्यष्टि-समष्टि का कल्याण करती हैं, अंतःकरण शुद्ध करती हैं, मुमुक्षु को ज्ञानोन्मुख करती हैं। इसलिए व्यवहार में उनका बहुत ही उपयोग है; परन्तु जहाँ वस्तु की प्रधानता से परमार्थ तत्त्व का निरूपण है, वहाँ श्रुतियाँ भेद को ज्ञाननिवर्त्य; अतएव मिथ्या बताती है। जो वस्तु अज्ञान से सिद्ध होती है; वह मिथ्या होती है और जो ज्ञान से निवृत्त होती है, वह भी मिथ्या ही होती है। अतएव सर्वाधिष्ठान  सर्वावभासक, स्वयं प्रकाश प्रत्यक्चैतन्याभिन्न अद्वितीय ब्रह्मतत्त्व के अज्ञान से तद्विषयक अज्ञानकृत सर्वभेद की आत्यन्तिक निवृत्ति हो जाती है। 

     बात यह है कि केवल इन्द्रिययंत्रों से तत्त्व का अनुसन्धान करने पर केवल एक या अनेक जड़सत्ता की ही सिद्धि होती है। चिद्वस्तु  यंत्रग्राह्य नहीं है। केवल बुद्धि से अनुसन्धान करने पर बुद्धि की शून्यता ही परमार्थरूप से उपलब्ध होती है; क्योंकि विचार-विक्षेपात्मक बुद्धि का अन्तिम सत्य निर्वाणात्मक शून्य ही है। भक्तिभावना युक्त बुद्धि के द्वारा अनुसन्धान करने पर सर्व प्रमाण-प्रमेय- व्यवहार के मूलभूत सर्वज्ञ सर्व शक्ति परमेश्वर की सिद्धि होती है। ऐसी स्थिति में स्वतःसिद्ध साक्षी को अपरिच्छिन्न अद्वितीय ब्रह्म बताने के लिए कोई इन्द्रिययंत्र या भाव-भक्ति समर्थ नहीं है।  उसका ज्ञान केवल औपनिषद ऐक्यबोधक महावाक्य से सम्पन्न होता है।    

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