भक्ति

  • यह निश्चित है कि ईश्वर के लिए किया हुआ एक भी संकल्प व्यर्थ नहीं जाता; क्योंकि वह एक चेतन कल्पवृक्ष है और अपने प्रेमी की सब इच्छाओं को जानता तथा उन्हें पूरी करने का सामर्थ्य रखता है। उसका हृदय बहुत ही कोमल है। प्रेमी की प्रत्येक प्रार्थना पूरी होगी। 
  • कृष्ण की शरण ले लो। हर जगह तुम्हें मदद मिलेगी। विश्वास और निष्ठा से जब तुम पुकारोगे, वे अवश्य आयेंगे। 
  • अपने प्राण-प्यारे आनन्द-मुकुन्द की स्मृति और सेवा पूजा हो तो और कुछ नहीं चाहिए। अपना देवता अपने मन में रहे। उसकी सेवा-पूजा ही अपनी साधना हो। 
  • पारस्परिक प्रेम से सब काम बन जाते हैं। कृष्ण की सेवा और प्रसन्नता भी सुलभ हो जाती है। मन में उद्वेग भरा हो तो भगवान् के भजन में भी बाधा पड़ती है। जिसको भी तुम आनन्द दोगे और सेवा करोगे, वह तुम्हारे अनुकूल हो जायेगा। जिद और दबाव से सब काम बिगड़ जाते हैं। 
  • किसी भी देश और वेश में रहो, अपने हृदय सुखस्वरूप परमात्मा से तर रक्खो। श्री कृष्ण सर्वदा रक्षक हैं। 
  • यदि मनुष्य के मन में कोई दुःख, चिन्ता या भय हो तो उसे भगवान् का स्मरण करना चाहिए, मङ्गल होगा। 
  • इस जीवन को सुखी और शान्त बनाने के लिए श्रीकृष्ण-प्रेम ही सर्वोपरि है। मुकुन्द ही आनन्द की एकमात्र निधि है। सर्वदा भजन करना। 
  • अपने तो ठाकुर जी के इशारे पर नाचने वाले हैं। जैसे जब जहाँ रखें , रहने को तैयार। ब्रज के प्रेमी कहते हैं-                                                             

                                                                   “जैसे राखहु, वैसे रहौं।’                                                            

  • अपने प्रियतम प्रभु की इच्छा से नरक में रहना भी अच्छा है। अपनी वासना-पूर्ति के लिए स्वर्ग में रहना भी स्वार्थ ही है। 
  • भोजन का छोटा भाई भजन। जैसे भोजन बिना नहीं चलता, भजन बिना भी न चले। भजन अपनी खुराक बने, जीविका बन जाये। काल का लोप भले हो जाय, भजन न छूटे। जगह, समय आसन – सब बदल जाय पर भजन न छूटे।      

new sg

              

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