जीवनोपयोगी सूत्र

     दूसरे की जानकारी ही दुःख है। हम अंग्रेजी नहीं पहचानते। A, B अभीतक जानने की कोशिश नहीं की, प्रयत्न करता तो जान लेता। गिनती में भी वही बात है। 6 और 9 में गलती होती है। मैं छोटा था तब अंग्रेजी बोलने वालों की बस्ती में जाता था। वहाँ के लड़के हमें देखकर अंग्रेजी में गालियाँ देते थे; किन्तु हम तो कुछ समझते न थे ! एक अंग्रेज अफ़सर ने कहा : ‘ये लड़के तो बड़े असभ्य हैं, वे तुम्हें गाली देते हैं। यह जाना; तब दुःख हुआ। जीवन में दुःख बाहर से नहीं आता, भीतर से निकलता है। दूसरे का दोष जानना दुःख है। अभिमान करना कि मैं बड़ा विद्वान् और दूसरों में दोष देखना; यह विद्वान् होकर दुःख निकलता है। एक व्यक्ति ने पाँच रुपया खोया और दुःखी हुआ। मैंने कहा : ‘चला गया? कुछ आया तो नहीं ? अब दुःख बुलाना क्यों ? जो गया उसे जाने दो। रुपया गया तो गया, दुःख मन में क्यों आये? डाकू पैसा ले जाय और उस डाकू को क्यों घर में बुलाना ? दुःख मेहमान है। 

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     हमारे गुरु, परम गुरु, परात्पर गुरु किस मार्ग पर चले हैं, वे किस प्रकार साधक को धीरे-धीरे ऊपर उठाकर मार्ग पर चलाते हैं, यह समझ कर हमें भी वैसे ही करना चाहिए। 

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     मैं अट्ठारह-उन्नीस वर्ष की वय में ही संतों के चक्कर में पड़ गया था। मुझे सत्सङ्ग – कुसङ्ग दोनों मिले। अच्छाई-बुराई,ईमानदारी-बेईमानी दोनों हम जानते हैं। ऐसे ही जीवन की धारा बहती रहती है, चक्रवत् घूमती रहती है। हमारे साधन, आचरण पवित्र होने चाहिए। 

new sg

 

 

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