साधु सावधान!

    एक महात्मा ने बताया, ‘कपड़ा चाहे सफेद हो या गेरुआ, घर में रहो या वन में, अपने को परिच्छिन्न जीव मत मानो। यह बात समझ में न आये तो गुरु से मिलकर समझो और यह निश्चय कर लो कि संसार के इन झगड़ों का हमारे मन से कोई सम्बन्ध नहीं है।’ मेरे मन में यह बात चमकी कब ? जब मैं श्री उड़ियाबाबा के सम्पर्क में आया। उनकी एक-एक बात अज्ञान को जड़मूल से उखाड़ने वाली थी। मैं अपने अनुभव की एक बात सुनाता हूँ – ‘मेरे पास एक आदमी आया। उसने मुझसे पूछा कि ‘मैं परमात्मा की  प्राप्ति के लिए क्या करुँ?’ मैंने उसे समझाया कि ‘परमात्मा की प्राप्ति के लिए कर्म, ध्यान, योगाभ्यास, भक्ति कुछ भी करने की जरुरत नहीं है।’ वह दूसरे दिन मेरे पास आया और बोला : ‘मैंने सब छोड़ दिया, ज्ञान योग भक्ति। ज्ञान ऐसे ही हो जाता है तो इस लफड़े में क्यों पड़ें ?’ मैंने पूछा : ‘तुमने क्या-क्या छोड़ा?’ उसने कहा : ‘सब छोड़ा’ फिर मैंने पूछा : ‘क्या दुकानदारी छोड़ी ?’ वह बोला : ‘नहीं, दुकान छोड़ेंगे तो खायेंगे क्या ? ‘मैंने पूछा, ‘अच्छा, दुकान भले रहे; व्यापार तुम ईमानदारी से करते हो ?’ उसने कहा : ‘ईमानदारी से व्यापार कैसे चलेगा ? बेइमानी तो करनी ही पड़ती है।’ फिर मैंने कहा : ‘तुम ब्लैक तो नहीं करते होगे ! उसने बताया: ‘अरे, इस  जमाने में इसके बिना तो चल ही नहीं सकता !’ उसने न दुकान छोड़ी, न बेइमानी छोड़ी, न ब्लैक करना छोड़ा  और सारे साधन छोड़ दिए ! मैंने मन में सोचा कि मैंने इस आदमी का कल्याण किया या अकल्याण ? तब मेरे मन में निश्चय हुआ कि जीवन में जितने ‘कु’ अर्थात् धर्मदृष्टि से निषेध है; उनको छोड़ना चाहिए। शास्त्र में बुराइयों का निषेध है, भक्ति योगाभ्यास आदि का निषेध नहीं है। शास्त्र में जो साधन बताये गए हैं; उनका कभी विरोध नहीं करना चाहिए, साधन में जो बाधक हैं उनका विरोध करना चाहिए। साधन करते-करते जब बुराइयाँ शिथिल पड़ जाएँगी, तब केवल अच्छाइयाँ रह जाएँगी। अज्ञान का पर्दा हल्का है।  ज्ञान होने पर अच्छाई-बुराई का भेद मिट जायेगा। 

     निषेध बुराई का किया जाता है, अच्छाई का नहीं। जब हम लोगों के बीच में वेदान्त का ज्ञान करवाते हैं  तब अधिकारी, अनधिकारी सबके बीच में बोलते हैं। एक बात निश्चित है कि जो लोग वेदान्त के नाम पर सदाचार का, भक्ति का, योगाभ्यास का, सत्शास्त्र का खंडन करते हैं; वे लोगों को ठीक रास्ते पर नहीं चलाते हैं। वे उनको ऐसे मार्ग पर डाल देते हैं जहाँ से उठने का उपाय ही नहीं है। वे लोग सदाचार की नींव को ही खण्डित कर रहे हैं। 

     तत्त्वज्ञान के लिए पहले दुर्वासना का, ईश्वर पर अविश्वास का, विक्षेप का, बुराई का खण्डन करो। इतनी बुराइयों के रहते साधन का खण्डन करना वेदान्त का मार्ग नहीं है।  

     इसलिए साधन का हम प्रारम्भ से ही समर्थन करते हैं। एक यज्ञोपवीत धारी ब्राह्मण को अपने विवेक को जागृत कर उसे बढ़ाना चाहिए। आजकल वेदान्त के नाम पर उच्छृंखलता और बुराइयों का जो पोषण हो रहा है; वह ज्ञान का मार्ग नहीं है। ऐसे कभी किसी को आत्मसाक्षात्कार हुआ नहीं है और होगा नहीं।  

 

new sg

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