चाचा की चपत का चमत्कार

     महामहोपाध्याय श्रीशिवकुमार शास्त्री  का जन्म काशी के निकट उन्दी ग्राम में हुआ था। बाल्यावस्था में ही पिता की मृत्यु हो गयी। चाचा पालन-पोषण करने लगे। 

     चाचा ने बालक शिवकुमार को भैंस चराने के काम में लगा दिया। ग्यारह वर्ष की उम्र। चरवाहे के काम में उनका मन नहीं लगता था। कभी तलाब पर स्नान करके शिवजी की पूजा करते; कभी कोई पुस्तक मिल जाती तो पढ़ने का प्रयत्न करते। एक दिन पुस्तक पढ़ने में तन्मय  बालक को चुपके से आकर चाचा ने एक चपत मारी  और डाँटा –

     ‘चल, चल, भैंसों की देखभाल कर। मूर्ख ! तू काम-धन्धा  छोड़ कर पतञ्जलि बनने चला है।’ कठोर चपत की चोट से बालक का हृदय ग्लानि और पीड़ा से भर गया। बिना किसी को बताये रातों-रात काशी पहुँच गया। विश्वास, लगन, तन्मयता, ईश्वरभक्ति बालक के रोम-रोम में भरी थी। बड़े ही कष्ट से अपना बाल्य जीवन व्यतीत किया। वेद, वेदाङ्ग, दर्शनों का इतना बड़ा विद्वान् उन दिनों विश्व में कोई दूसरा नहीं था। जितना वैदुष्य इन्होंने प्राप्त किया; वह अभूतपूर्व था। देश के बड़े-बड़े विद्वान्-मूर्धन्य इनके शिष्य हुए। ईश्वर कृपा और पौरुष के मेल से एक असहाय बालक कितनी उन्नति कर सकता है, इसका एक यह उदहारण है। 

     माता और चाचा के बहुत अनुनय-विनय करने पर भी ये आजीवन कभी लौटकर अपने गाँव नहीं गए। 

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