‘संन्यास क्या है ?’

    देखो, बुरा समझ करके सम्बन्ध-त्याग करना संन्यास का धर्म-पक्ष है। अच्छाई को भगवदर्पित करना उपासना-पक्ष है। सबसे सम्बन्ध-रहित होना योग-पक्ष है। ‘यह मठ मेरा है’, ‘यह चेला मेरा है’, यह बैंक-बैलेंस मेरा है’- इसका नाम संन्यास नहीं है। किसी भी स्थान, व्यक्ति, वस्तु से अपना सम्बन्ध न मानना संन्यास की उच्चकोटि की अवस्था है। जो सम्बन्ध-त्याग मनमाना होता है, वह टिकाऊ नहीं होता है। विवेक और शास्त्रादेश दोनों चाहिए। कभी-कभी हमारा विवेक हमको गलत रास्ते पर ले जाता है, क्योंकि हमारी बुद्धि में वासना मिली रहती है। अतः शास्त्रादेश के तराजू पर अपने विवेक को तौल लेना चाहिए कि हमारा विवेक हमको ठीक रास्ते पर ले जा रहा है कि नहीं ! शास्त्र के तराजू पर विवेक की समीक्षा करनी चाहिए। अब जो सरकारी कानून बनते हैं, उनको मूलभूत संविधान के न्याय पर जाँचना पड़ता है। आज राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री प्रधान नहीं है। कोई संसद-सदस्य या सरकारी अधिकारी प्रधान नहीं है। सबके सिर पर संविधान बैठा हुआ है।  जो भी सरकारी अध्यादेश जारी होता है, उसकी जाँच-पड़ताल होती है कि वह संविधान के अनुकूल है या प्रतिकूल।  भाई मेरे ! वेद के आधार पर जो संविधान है, वह सत्य है, शाश्वत है, यथार्थ प्रमाण है। अतः वेद-शास्त्रादेशानुसार अपने विवेक की समीक्षा करनी चाहिए। शास्त्रसम्मत  विवेकयुक्त-बुद्धि के द्वारा समस्त दृश्य-प्रपञ्च के सम्बन्ध से रहित होकर अपने असङ्ग आत्मस्वरूप में अवस्थित होना ही संन्यास है। 

new sg  

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: