ईश्वर का चिन्तन कैसे करें ? (6)

     ‘मद्रचनानुचिन्तया’ऐसी कोई क्रिया नहीं होती, जिसमें भगवान् की दया, करुणा, वात्सल्य न हो। मनुष्य की बुद्धि दूसरी ओर लगी रहती है, अतः इस लीला में भगवान् की कृपा समझ में नहीं आती। कभी-कभी किसी से वियोग होने में लाभ होता है। कभी पैसा खोने में भी लाभ होता है। कभी-कभी किसी के मरने में भी लाभ होता है। संन्यासी होना त्यागमय जीवन-अकेला जीवन बिताना, इसमें भी भगवान् की कृपा है। 

     एकबार मैं घर से भागकर चित्रकूट जा रहा था। मार्ग में एक परिचित मिले। बोले- ‘अकेले जा रहे हो या कोई साथ है?’

     मैंने कहा – ‘मैं हूँ और मेरा भगवान् है।’ जब दूसरे साथ होते हैं, तब भगवान् का पता नहीं लगता। हम अकेले होते हैं तब भगवान् का पता चलता है कि वह हमारी कैसे सहायता करता है। मुझे ऐसे स्थान पर रोटी मिली है, जहाँ रोटी मिलने की कोई आशा नहीं थी। भूखे थे तो मार्ग में चलते-चलते किसी ने बुलाकर खिला दिया। जिसने आपको मुख दिया, शरीर दिया, पेट दिया, उसी ने रोटी दी है। आपकी एक-एक चेष्टा भगवान् की दृष्टि में है। जीवन में जो भी घटना घटे, उसमें  भगवान् का हाथ-भगवान् की करुणा देखो-

तत्तेsनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्। 

हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते  जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक्।।

     भगवान् की कृपा को भली प्रकार देखता हुआ, अपने शुभाशुभ कर्म फल को भोगते हुए, हृदय, वाणी, शरीर से जो भगवान् के सम्मुख नत रहता है, मुक्तिपद का वह उत्तराधिकारी  है। 

                                                                                                                               (क्रमशः)

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