ईश्वर का चिन्तन कैसे करें ? (3)

       ‘मद्रचनानुचिन्तया’सृष्टि के रूप में यह परमात्मा का कौशल सामने है। एक-एक वस्तु में उनकी विलक्षण निपुणता है। आप नल के जल का टैक्स देते हो, पंखे के चलाने का टैक्स देते हो। किन्तु वर्षा के जल का टैक्स लगता है ? श्वास लेने की वायु पर कोई  कर है ?

     ‘यावज्जीवं त्रयो वन्द्या वेदान्तो गुरुरीश्वरः।’ वेदान्ती को भी यावज्जीवन वेदान्त, गुरु तथा  ईश्वर की सेवा करनी चाहिए; क्योंकि ईश्वर ने अतःकरण शुद्ध किया, गुरु ने हमारे जीवन का निर्माण किया, वेदान्त शास्त्र से ज्ञान प्राप्त हुआ। इनके प्रति कृतघ्न हो जाओगे तो ज्ञान प्रतिबद्ध हो जायेगा। अतः इनके प्रति कृतज्ञ बने रहना चाहिए।

     अन्न,वस्त्र, गौ आदि वस्तुओं के देने की क्रिया जब धर्म और वस्तु के संयोग से संपन्न होती है, तब उससे मन पवित्र होता है। जब किसी को कुछ देकर बदले में कुछ लाभ इसी लोक में चाहते हैं, तब धर्म विकृत हो जाता है। जैसे श्राद्ध में अपने रसोईये को खिलाकर उसे रुपया, धोती दें और उससे सेवा चाहें। वस्तु, क्रिया, विधि, सद्भाव तथा संकल्प के सम्बन्ध से धर्म होता है। मीठे शब्द का दान भी धर्म है। 

     परमात्मा तथा जगत् के तत्त्व का विधिवत् विचार करने से ज्ञान होता है। मनमाने ढंग से विचार करने से ज्ञान नहीं होता। योग में वस्तु की आवश्यकता नहीं, क्रिया की आवश्यकता नहीं, सङ्कल्प की आवश्यकता नहीं और विचार की भी आवश्यकता नहीं। बस मन को रोक दो। इन सबसे भक्ति विलक्षण है। इसमें न ब्रह्मविचार है, न मनोविरोध है, न वस्तु देना और न क्रिया करना। भक्ति प्रेमात्मिका वृत्ति है। भक्ति यह है कि एक-एक पदार्थ में, क्रिया में भगवान् का स्मरण हो। 

      एक महात्मा को किसी ने केला दिया। उन्होंने केले को छीला, बस वे तो केला खाना भूल ही गये। उनके नेत्रों से अश्रु-प्रवाह चलने लगा। वे केले को ही देखते रह गये। देने वाले से पूछा – ‘केले के भीतर इतना उत्तम हलवा किसने रखा? किसने छिलके से उसकी ऐसी रक्षा की कि मक्खी, मच्छर का मुँह वहाँ नहीं पहुँच सका? वह मुझसे बहुत प्रेम करता होगा ?’

‘आराममस्य पश्यन्ति न तं  पश्यति कश्चन’ –श्रुति 

     उसके सृष्टिरूप  बगीचे को लोग देखते हैं; किन्तु उसे कोई नहीं देखता। ‘रचनानुपपत्तेश्च ना नुमानम्’(ब्रह्मसूत्र) कभी भी अज्ञातरूप से अपने आप इतनी उपयुक्त ,समझदारी से बनी रचना नहीं हो सकती। लेकिन अनुमान से जगत्कर्ता नहीं जाना जाता।  अनजान रूप से प्रकृति बदलती रहती है और स्वयं सब बन जाता है- ऐसा नहीं हो सकता। 

                                                                                                                             (क्रमशः)

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