‘अच्युतस्य पादाम्बुजोपासनं।’

     भगवान् को बोलते हैं ‘अच्युत’। आपके दादा-परदादा तो चू गए, च्युत हो गए, गिर गए। आपका धन भी च्युत हो गया। दुनिया में जो फरा सो झरा; जो बरा सो बुताना। सारी दुनिया चू जाती है। कब,कब !! जैसे आम पेड़ पर से चू जाते हैं, वैसे दुनिया में सब टपकते जा रहे हैं। दुनिया की सब चीजें टपक रही हैं। एक ऐसी चीज़ है, जो कभी आपको छोड़कर नहीं जा सकती। न आजतक कभी छोड़ा है, न आगे कभी छोड़ेगी। न छूट सकती है – ‘अच्युतस्य’। हमारी तो घड़ी कहीं छूट गई, पेन कहीं छूट गया, पुस्तक कहीं छूट गयी। बचपन कहीं छूट गया, जवानी कहीं छूट गयी। काले बाल कहीं छूट गए। दाँत कहीं छूट रहे हैं। है कि नहीं ? ये सब च्युत होते हैं। एक ऐसी चीज़ है जो अच्युत है। और, वह सबको नित्य प्राप्त है। सबके दिल में है। ‘न च्यवते इति’ वह कभी चू नहीं जाता, अच्युत है।  कौन ? परमात्मा। उसके चरणारविन्द में आसन जमा लो। आसनं उपासनं। ‘अच्युतस्य पादाम्बुजोपासनं’– बिलकुल उसके पास आसन लगाकर बैठ जाओ !

     एक मछली मारने वाला मछुआरा जाल फैलाकर मछली पकड़ रहा था। सो वहीं एक संत नहा रहे थे। एक मछली ने संत को देखा। और उनकी ओर आकर्षण हुआ। उसने कहा कि महाराज, बचाओ। तो संत ने इशारा किया कि तुम मछुआरे के पाँव के पास चली जाओ। अब देखो, जाल में फँसेगी क्या मछली ? बिलकुल नहीं। जाल से छूट गयी। यह जो मायाजाल फैला हुआ है, वह जिसने फैलाया, उसके चरणों के पास बैठ जाओ। 

     दाल दली जा रही थी, आटा पिसा जा रहा था। उसमें था एक घुन। उसने अपने गुरुदेव का स्मरण किया। गुरुदेव ने कहा  कि  तुम  कील के पास चले जाओ ।  जहाँ  से  चक्की घूमती है,  बीच  में  कील होता है।  अरे महाराज, वह तो बच गया। सारे जौ पिस गए, मटर की दाल बन गयी,गेहूँ पिस गया  और घुन बच गया। 

     तो नारायण, यह दुनिया जिस कील के आधार पर घूम रही है, यह माया का जाल जिसने फैलाया है, उसके चरणारविन्द में चल कर बैठ जाओ ! आप जाल से बच जाओगे, आप पिसने से बच जाओगे !!

‘अच्युतस्य पादाम्बुजोपासनं’ ।  

 

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