‘भगवद्-भक्ति’

    ईश्वर ने तुम्हें जो उत्तम अवसर दिया है, भोग-विलास में आसक्त न होकर त्याग, वैराग्य, सयंम से अपना भजन करने का, उसका पूरा लाभ उठाना चाहिए। यह मनुष्य जीवन बार-बार नहीं मिलता। इसलिए बड़े प्रेम से निरन्तर परमात्मा के स्मरण का अभ्यास करना चाहिए। सर्वत्र भगवद्-दर्शन करना चाहिए। आकाश को देखकर भगवान् के श्याम-रंग का आभास हो। बादल देखकर घनश्याम, गाय को देखकर गोपाल, मोर को देखकर मोर-पंख-धारी, मोर-मुकुटवाले, यहाँ तक कि गधे को देखकर होली के समय भगवान् के क्रीड़ा-कौतुक का स्मरण हो जाय। 

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    भगवत्प्राप्ति के लिए यदि भक्त सांसारिक मर्यादाओं का उल्लंघन कर सकता है तो भगवान् भी सारी मर्यादाएँ तोड़कर अपने प्रेमी भक्त के पास दौड़े आते हैं। वे अपने भक्त को कदापि नहीं छोड़ सकते। यह उनके वश की बात नहीं है। 

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