‘त्यागेनैके अमरत्त्वमानशुः’

    भाई मेरे ! देखो ! यदि तुम संसार में कहीं भी फँस जाओगे, तो तुम्हें रोना पड़ेगा। यह बात बिलकुल सच्ची है। तुम चाहे धन में फँसो, चाहे मकान में फँसो, चाहे परिवार में फँसो, चाहे यार-प्यार में फँसो, चाहे शरीर में फँसो, चाहे अन्य कहीं भी फँसो। हाँ, यदि तुम संसार में फँसोगे, तो तुम्हें रोना पड़ेगा। जिसके जीवन में फँसाव नहीं है, वह रो नहीं सकता है। बन्धन और रोना- ये दोनों दुनिया में आसक्ति मानने से हैं। आसक्ति मानी हुई चीज़ है भला। आसक्ति है नहीं। तुम्हारे पास जन्म के पहले क्या था ? तुम्हारे पास मरने के बाद क्या रहेगा ? यह शरीर भी तो तुम्हारे पास रहने वाला नहीं है। जहाँ तुम फँसे हो, वह तुम्हे हमेशा के लिए नहीं मिला है। बस, आप अपने सामर्थ्य को समझिये। आपके अन्दर इतना सामर्थ्य है कि आप धन, मकान, बेटा-बेटी, पति-पत्नी, माता-पिता, भाई-बहन शरीरादि सबको छोड़ सकते हो। 

    जब मैं सन् 35-36 में बम्बई आया था, तब एक बड़ा भारी मकान बिलकुल अकेला-उजाड़ पड़ा देखा। पूछने पर मालूम पड़ा कि यह मकान किसी नरीमन का था। इसके मालिक इसको छोड़कर चले गए हैं; अब इसमें भूत रहता है। भला बताओ ! भूत के भय से इतना बड़ा मकान बिलकुल खाली पड़ा था। देखो ! नारायण ! आपके भीतर मकान का त्याग करने का सामर्थ्य है। जब पत्नी दूसरे से फँस जाती है, तब पति के मन में पत्नी के परित्याग की बात आ जाती है। जब पति पराये घर जाने लगता है और ज्यादा शराब पीने लगता है, तब पत्नी के मन में पति को छोड़ने की बात आती है। भले ये उसको छोड़ सकें अथवा न छोड़ सकें। 

    तो नारायण, मनुष्य जीवन का एक सत्य है, त्याग। अतः वेद-वचन है- ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः’ तेन त्यक्तेन अर्थात् त्यागेन भावेन- त्याग का भाव रखते हुए भोग करो। ‘आत्मानं पालयेथाः’– अपनी रक्षा करो। मकान की रक्षा में मत लग जाओ। पैसे की रक्षा मत करो। परिवार एवं अपने देह की रक्षा में मत लगो। अपने आत्मा की रक्षा करो। सबको त्याग कर रहना – यह आत्मा का स्वरुप है। यदि इसको अपने जीवन में विकसित कर लोगे, तो वह तुम्हारे जीवन को सुखी रखेगा।      

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