निष्काम कर्मयोग

इसकी चार भूमिकाएँ हैं :-

  1. फलासक्ति का त्याग 

  2. कर्तापन के अभिमान का त्याग 

  3. कर्मासक्ति का त्याग 

  4. अकर्तापन के अभिमान का त्याग 

    इनमें प्रथम दो तो समझ में तुरन्त आ जाती हैं और अभ्यास एवं प्रयत्न करने पर आचरण में भी उतर आती है। परन्तु फल की इच्छा तथा कर्तापन का अभिमान न होते हुए भी  हम उपस्थित कार्य पूरा करना अवश्य चाहते हैं। भला क्यों, किसलिए ? माना, हम श्रीहरि की प्रसन्नता के लिए कथा कर रहे हैं। श्लोकों की अर्धाली बोली, आरती का घंटा बज गया। क्या बता सकते हो, हम क्यों श्लोक का उच्चारण पूरा करना चाहते हैं ? जब हम कुछ फल नहीं चाहते, जब हम कर्ता नहीं, किस लक्ष्यार्थ से इच्छा करते हैं कि श्लोक का पाठ पूरा हो जाये ? घर-गृहस्थी के काम भी क्यों पूरे हों ? क्यों न हम इस क्षण, इसी स्थान से, सब व्यवस्था छोड़कर, विरक्त होकर चले जाएँ, अथवा विदेहमुक्त हो जाएँ।  क्या हमारे मन में अगले क्षण की कुछ आसक्ति बनी है? यदि है तो छोड़नी पड़ेगी। इतनी सब आसक्ति छोड़ने के बाद चित्त में अनासक्ति आती है; परन्तु अकर्तापन का एक अभिमान बना रहता है जो बड़ा सूक्ष्म होता है और कठिनता से कटता है। ;यदि वह कट जाये तो ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है, क्योंकि इस प्रकार का निष्काम कर्मयोग साधन नहीं, तत्त्व है। 

new sg

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