प्रेरक प्रसङ्ग

     एक बार महाराजश्री के सामने किसी ने नास्तिकों की निन्दा की। उन्होंने बीच में ही किन्तु बड़े प्रेम से कहा- ‘भैया, नास्तिक भी भगवान् के वैसे ही हितैषी हैं, जैसे किसी बड़े आदमी का सेवक अपने मालिक का। इसे यों समझना चाहिए कि जैसे मालिक को विश्राम करते देखकर सेवक आगन्तुक से कह देता है कि मालिक घर में नहीं है, वैसे नास्तिक भी- ‘भगवान् नहीं हैं’ यह कह कर उनके नित्य-निकुञ्ज-विहार में बाधा नहीं पड़ने देता। और, फिर नास्तिक भी तो भगवान् की ही सृष्टि में हैं। भला गर्भस्थ शिशु की किसी भी क्रिया से माँ नाराज़ होती है ? भगवान् भी किसी नास्तिक से नाराज़ नहीं होते।’

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    एक बार कोई साधु जनकपुर से वृन्दावन आए। श्रीमहाराजश्री ने उनके वहाँ के समाचार पूछे। साधु ने कहा-  ‘है तो सब ठीक, पर वहाँ के साधुओं में कथा-सत्सङ्ग प्रचलित नहीं है। सब मन्दिरों के अपने खेत हैं और सब साधु हल चलाते हैं। श्रीमहाराजश्री यह सुनकर बोले- ‘अरे महात्मा, श्रीजनक जी महाराज को हल चलाने से ही जानकी जी की प्राप्ति हुई थी न, इसीलिए वे लोग भी अपनी साधना ‘हल चलाने में ही मानते हैं।’

    किसी का भी दोष देखना असल में आपके स्वभाव में ही नहीं था।   

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