‘व्यवहार की शिक्षा’

    दोषों तथा दुःख का अत्यन्ताभाव केवल ब्रह्मज्ञान से होता है; परन्तु व्यवहार में सुखी होने के लिए किसी प्रकार का आवेश कभी नहीं होना चाहिये – न काम का, न क्रोध का, न लोभ का। पैसे की आमदनी और खर्च का उचित प्रबन्ध करना चाहिये; परन्तु उसमें महत्त्वबुद्धि तथा संग्रह का रस नहीं आना चाहिए। धन उद्योग व दान से बढ़ता है,परन्तु धन-प्राप्ति में असफल होने पर खर्च घटाना चाहिए, धन-प्राप्ति के लिए निन्दनीय कार्य नहीं करने चाहिए। माता-पिता, भाई-बहन व पत्नी-बच्चों से प्रेम का व्यवहार रखें, छोटी-छोटी बातों पर लड़ें नहीं। कुछ बातें मान कर व कुछ मनवाकर मेल से रहना चाहिए, जिद्द करना अल्प-बुद्धि का लक्षण है। अपने शरीर एवं बुद्धि से सबकी सेवा करते रहो, परन्तु मन में उसका कोई संस्कार या स्मृति न बने ऐसी चेष्टा भरसक करनी चाहिए। संसार को हमारा धन व तन चाहिए, मन नहीं। मन के भूखे अमना भगवान् हैं, उनको ही मन देना चाहिए। संसार के काम कभी समाप्त नहीं होते, इसलिए कालयापन करना चाहिए। इसका मन्त्र है, प्रत्येक अवस्था और परिस्थिति से तुरन्त अपना हाथ बचा कर निकाल ले। ऐसा न हो कि हम कहीं फँसे रह जाएँ। हमको किसी से प्रेम हो तो कर लें और अपने स्वेच्छा से छोड़ दें, परन्तु यह भ्रान्ति कभी न रखें कि कोई अन्य व्यक्ति हमसे प्रेम करता है। दुःख व बन्धन को किसी हाल में स्वीकृति नहीं दें। किसी के प्रेमाग्रह से ज्यादा या प्रतिकूल भोजन कभी नहीं करना चाहिए, क्योंकि अन्नब्रह्म से पेटब्रह्म अधिक महत्त्वपूर्ण है। अपने वैराग्य के अभिमान के कारण किसी से लड़ना नहीं चाहिए। अपने नियमों के पालन में यथासम्भव दृढ़ रहो, परन्तु नियम का अभिमान नहीं हो। बड़ा नियम होता है, नियम को धारण करने वाला नहीं। स्वास्थ्य की रक्षा करना आवश्यक है। निरन्तर भजन करने के नाम पर स्वास्थ्य खराब कर लेना मूर्खता है। ऐसा मनुष्य पूर्णता का अधिकारी नहीं है। जीवन सरल और स्निग्ध होना चाहिए। 

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