सत्सङ्ग-चर्चा

    एक दिन किसी स्त्री ने महाराजश्री से प्रार्थना कर कहा – ‘आशीर्वाद दीजिये कि भगवान् श्रीकृष्ण में मेरी दृढ़ भक्ति हो।’ श्रीमहाराजश्री ने कहा- ‘बस ! तुम इसी तरह, जड़-चेतन जो भी तुम्हारे सामने आए, उसे प्रणाम कर श्रीकृष्ण-भक्ति की याचना करती रहो, तुम्हें शीघ्र ही उसकी प्राप्ति हो जायेगी। इस लालसा का दृढ़ होना ही तो भक्ति है।’

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    किसी भक्त ने महाराजश्री से प्रश्न किया- ‘अनन्य भक्त कौन ?’

    श्री महाराजश्री ने उत्तर दिया- ‘जो आठों प्रहर अन्तर्मुख रहता हो।’ इस पर श्रीसाईंसाहब, जो वहाँ बैठे थे, बोले कि ऐसा भजन तो आप ही करते हैं।’ इस पर श्रीमहाराजश्री बोले- ‘मैं भजन नहीं करता, बल्कि भगवान् ही मेरा भजन करते हैं। उनका अनुग्रह देखकर ही मेरा हृदय आनन्द से गद्-गद रहता है। बात असल में यह है कि जीव में तो उनके भजन करने की शक्ति ही नहीं है। जो कुछ होता है, उनकी दया से ही होता है।’

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    एक बार यह प्रसङ्ग चल रहा था कि भगवान् सर्वत्र हैं और सबमें हैं। एक शिष्य ने पूछा, ‘महाराजश्री,आप उसे कैसे देखते हैं।’

    श्री महाराजश्री तुरंत बोले- जैसे तुम्हें देख रहे हैं।’   

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