‘यह देखो कि आपका दिल कैसा है।’

    प्रश्न यह आया कि जो हमारे धर्म,कर्म हैं उनके बारे में क्या करना चाहिए ? तो यह बात बतायी कि आप कर्म मत देखो कि कैसा है, और, धर्म भी मत देखो कि कैसा है ! यह देखो कि आपका दिल कैसा है !! कर्म में न अच्छाई होती है और न बुराई होती है। 

‘प्रसज्यवित्तः हरणं न कल्कः। 

    कभी जबरदस्ती किसी से पैसा ले  लिया जाए तो पाप नहीं लगता ! पर किसका पैसा लें ? यदि पति अपनी पत्नी का पैसा ले ले जबरदस्ती, और पत्नी अपने पति के जेब में से निकाल ले, नारायण वह पाप नहीं है। चोरी नहीं है। तो वह क्या है? बोले भाई, वह तो प्रेम है।  क्योंकि, दिल में प्रेम है,  यह अपना-पन है। 

    भाई मेरे, यदि अपना मन बुरा है, तब तो पाप है और मन बुरा नहीं है तो पाप नहीं है।  इसलिए, पहले अपने दिल को देखो !तुम्हारे मन में किसी वस्तु के प्रति राग है ? किसी की मोहब्बत में पड़कर काम कर रहे हो क्या? तुम्हारे मन में किसी से नफ़रत है ? नारायण, जिससे नफ़रत होती है, उसका अच्छा काम भी बुरा लगता है और जिससे मोहब्बत होती है, उसका बुरा काम भी अच्छा लगता है। तो तुम काम मत देखो। यह देखो कि तुम्हारे दिल में राग है कि द्वेष, मोहब्बत है कि नफ़रत ?

    यदि राग है अपने हृदय में, तो उसको शुद्ध करने के लिए सत्कर्म का अनुष्ठान करना चाहिए। और, यदि वैराग्य है, तो तत्त्वज्ञानी के पास जाकर तत्त्व की जिज्ञासा करनी चाहिए। और, न पूरा राग है, न पूरा वैराग्य है, तब क्या करना चाहिए ? तब भगवान् से प्रेम करना चाहिए। क्योंकि, भगवान् की भक्ति करने में राग-वैराग्य दोनों की संगति लग जाती है। तो विरक्तों के लिए तत्त्वज्ञान है, अनुरागियों के लिए कर्मानुष्ठान है और जो बीच में हैं, उनके लिए भगवान् की भक्ति है।   

new sg  

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: