‘धर्मनिष्ठा का फल’

      प्राचीन समय में अङ्गिरा ऋषि के पुत्र सुधन्वा और प्रह्लाद के पुत्र विरोचन दोनों में एक सुन्दरी स्त्री के लिए यह विवाद चल पड़ा कि कौन श्रेष्ठ है ? दोनों ही अपने-अपने को श्रेष्ठ बतला रहे थे। प्राणों की बाज़ी लग गई – जो श्रेष्ठ हो, वह जीते; जो हार जाये, वह प्राण-त्याग करे। इस विवाद निर्णय के लिए वे प्रह्लाद के पास गये। दोनों की बात सुनकर प्रह्लाद बड़ी चिन्ता में पड़ गये; वे न तो अधर्म चाहते थे और न तो दोनों में से किसी की मृत्यु। उन्हें असमंजस में पड़े देखकर सुधन्वा ने कहा – ‘दैत्यराज ! यदि तुम पुत्र-स्नेह के कारण झूठ बोलोगे या कुछ उत्तर न दोगे तो इन्द्र वज्र के प्रहार से तुम्हारे सिर के सौ टुकड़े कर देंगे। प्रह्लाद महात्मा कश्यप के पास गये। उन्होंने महात्मा कश्यप से कहा- आप कृपा करके बताइये- जो कोई प्रश्न का ठीक-ठीक उत्तर नहीं देता या जान-बूझ कर झूठ बोलता है, उसे मरने पर कौन से लोक प्राप्त होते हैं ?’ कश्यप ने कहा- ‘जो क्रोध या भय के कारण जान-बूझ कर प्रश्नों का उत्तर नहीं देता अथवा झूठ बोलता है, उसे मृत्यु के पश्चात् वरुण की फाँसी में लटकना पड़ता है। जो साफ-साफ सत्य न कह कर गोलमटोल बोलकर दोनों पक्षों का जी रखना चाहता है, उसकी भी वही गति होती है। जिस सभा में अधर्म के द्वारा धर्म दबाया जाता है और सभ्य लोग धर्म  पक्ष न लेकर मौन ग्रहण कर लेते हैं, उस सभा के सभ्यों को भी अधर्म होता है। जहाँ निंदा करने योग्य कर्म की निंदा नहीं होती, वहाँ  पर सबसे श्रेष्ठ पुरुष को अधर्म का आधा पाप लगता है। आधे का आधा पाप कर्म करनेवाले को और बाकी  सभासदों को। जहाँ निंदनीय पापकर्म की निंदा की जाती है, वहाँ औरों को पाप नहीं लगता, केवल करनेवाले को ही लगता है। प्रश्न का अन्यथा उत्तर देने पर उसके पुण्य तो नष्ट हो ही जाते  हैं, साथ ही सात पीढ़ी आगे और सात पीढ़ी पीछे के लोग भी नरक में जाते हैं।’

      कश्यप के ये उपदेश सुनकर प्रह्लाद ने अपने पुत्र से कहा – ‘बेटा विरोचन ! तुम्हारी माता से सुधन्वा की माता श्रेष्ठ हैं, तुम्हारे पिता से अर्थात् मुझसे सुधन्वा के पिता श्रेष्ठ हैं। और,तुमसे सुधन्वा श्रेष्ठ है। अब ये सुधन्वा तुम्हारे प्राणों के  स्वामी हैं।’ प्रह्लाद की बात सुनकर  सुधन्वा बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा – ‘दैत्यराज ! तुमने अपने पुत्र के प्राणों की परवाह न कर के धर्म की रक्षा की है, इसलिए मैं तुम पर प्रसन्न हूँ और यह नहीं चाहता कि तुम्हारे पुत्र की मृत्यु हो। यह सौ वर्षों तक जीवित रहे और सुख भोगे।’

      इस प्रकार धर्म निष्ठा के फलस्वरूप प्रह्लाद ने अपने पुत्र की रक्षा कर ली। 

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