विचारणीय :

      जिनका धर्म से प्रेम है, वे कैसी भी परिस्थिति में पड़ जायें, धर्म उनका साथ नहीं छोड़ सकता। वे स्वयं आश्रयहीन होने पर भी दूसरों के आश्रय होंगे। वे स्वयं उपकार के पात्र होने पर भी दूसरों का उपकार करेंगे। जो सर्वदा दूसरों को देते चले आए हैं, वे अपने पास कुछ न रहने पर भी दूसरों को कुछ-न-कुछ देंगे ही। इसके ठीक विपरीत जो अधर्म से प्रेम करते हैं, अन्याय को आश्रय देते हैं, परपीड़न में ही उत्साह रखते हैं, वे चाहे कितनी भी अच्छी परिस्थिति में पहुँचा दिये जायें, अपनी दुष्टता नहीं छोड़ेंगे। यह बात कौरव और पाण्डवों के चरित्र में बहुत स्पष्ट रूप से दीखती है। 

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        सज्जन पुरुषों में यह स्वाभाविक गुण होता है कि यदि दूसरा कोई उनका अनिष्ट करना चाहे तो वे यथाशक्ति अनिष्ट से अपने को बचाने की चेष्टा करते हैं, परन्तु अनिष्ट करनेवाले का अनिष्ट नहीं करना चाहते। वे स्वभाव से ही सबका हित चाहते हैं और हित चाहने में यह भेदभाव नहीं रखते कि कौन मेरा शत्रु है कौन मेरा मित्र है। वे दुःखी को देख कर दयार्द्र हो जाते हैं, अनिष्ट करने वालों को देखकर उसके अन्दर सद्-बुद्धि का संचार करने लिये तड़पने लगते हैं और पुण्यात्मा को देखकर उसके पुण्य की अभिवृद्धि के लिए सचेष्ट हो जाते हैं। उनके जीवन का यही नियम है।  

new sg

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