‘जगत् एक नाटक है या उसकी लीला है !’

      श्रवण, मनन और निदिध्यासन से जब यह निश्चय हो गया की सब कुछ परमात्मा है , तब यह भला है, यह बुरा है, इस प्रकार की दृष्टि ही क्यों होती है ? यह भला है- इस प्रकार की दृष्टि तो यथाकथञ्चित् क्षम्य भी है, परन्तु बुरे की कल्पना  तो सर्वथा विपर्यय है।  यदि सर्वथा समत्व न रहे, वैषम्य हो ही जाय, तो अपनी दृष्टि भले पर ही जानी चाहिए। परन्तु भले-बुरे की भावना और सत्ता को दृढ़ करने की क्या आवश्यकता; उन्हें तो शिथिल करना चाहिए। यदि प्रतीत होता है भला-बुरा, तो वह लीला विलास ही है, नाटक मात्र है। नाटक के भीम और दुर्योधन दोनों ही मनोरंजन के लिए हैं। नाटक की मृत्यु, रोग और उत्पीड़न रसानुभूति के लिए है। अद्-भुत, रौद्र, भयानक और बीभत्स भी तो रस ही है ! तब इनको क्षुब्ध होने का क्या कारण है ?

      यह भी आवश्यक नहीं कि नाटक को नाटक के रूप में स्मरण रखा ही जाय; नाटक देखते-देखते उसका नाटकत्व भूल जाना तो नाटक की अपूर्व सफलता और मनोहरता का चिह्न है। उस विस्मृति में भी यह निश्चय अडिग रहे कि  यह नाटक है। जो अभिनय अपने को मिले उसको पूर्ण करो और खूब सफलता के साथ। वैसे कठोर कर्तव्यों का भी पालन करो, भगवान् श्री कृष्ण के प्रति जिनका पालन भीष्म को करना पड़ा था। बस ध्यान  रहे, व्यावहारिक जगत् एक नाटक है और मैं उसका पात्र तथा द्रष्टा हूँ, भला-बुरा कुछ नहीं, सब लीला है।   

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