‘कृपा’

     भगवान् भगवान् ही हैं। उनका नाम श्रीराम रखो या श्रीकृष्ण। चाहे उनका मुकुट सीधा खड़ा हो या बांकी अदा के साथ बायें अथवा दाहिने लटक रहा हो। वे ब्रज के वन-निकुंज में गायें चरा रहे हों, गोपियों के साथ छेड़-छाड़ कर रहें हों, या धूलि में लोट रहे हों, अथवा श्री अवध के दरबार में राजसिंहासन पर गम्भीर भाव से बैठ कर राज्यकार्य का सञ्चालन कर रहे हों। नाम, पोशाक, काम या गुणों के प्रकटीकरण के भेद से भगवान् में भेद नहीं होता। वे खेलकर, खिलाकर, डाँटकर, पीटकर,नाचकर, गाकर हर हालत में जीवों पर अनुग्रह-दृष्टि की वृष्टि करते रहते हैं। 

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     भगवान् की कृपा और प्रेम अहर्निश एकरस सब पर बरस रहे हैं। सतत सावधान रहकर अपने-आपको और सारे संसार को उससे आप्लुत और आप्यायित अनुभव करना चाहिए। जैसे व्यास (वक्ता) ग्रन्थ के प्रत्येक शब्द का भाव अपने अनुकूल निकाल लेता है, वैसे ही प्रत्येक घटना का अभिप्राय प्रसाद और अनुग्रहरूप ही निकालना चाहिए। संसार में केवल वही दुःखी है जो प्रभु के आनन्द -मय करकमलों से सम्पन्न घटना की व्याख्या प्रतिकूल करता है। अपने हृदय को सर्वदा रसमय, मधुमय बनाये रखना चाहिए। 

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