‘सेवा’

     गुरु साहब के दो सेवक थे, एक पुत्र और दूसरा शिष्य। गुरु साहब ने अपने बैठने के लिए दोनों से चबूतरा बनाने के लिए कहा। पाँच – छः बार दोनों ने चबूतरे बनाये; परन्तु गुरुसाहब ने पसन्द नहीं किये। पुत्र सेवक झुँझला गया। उसने कहा- ‘अब तक आपको कोई चबूतरा पसन्द नहीं आया तो जिन्दगी भर पसन्द नहीं आयेगा।’ शिष्य सेवक ने कहा- ‘मुझे तो आजीवन आपकी आज्ञा का पालन करना है। चाहे प्रतिदिन एक ही काम करवायें, चाहे नये – नये। मुझे तो इस बात की प्रसन्नता है कि मैं आपकी आज्ञा का पालन कर रहा हूँ। कहना न होगा कि गुरु साहब की गद्दी का उत्तराधिकारी शिष्य ही हुआ, पुत्र सेवक नहीं।  

 

new sg

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