‘क्षमा’

      एकनाथ जी का नित्य गोदावरी स्नान करने का नियम था। उनकी सरलता, मैत्री, भगवद्भक्ति आदि सद्-गुणों के कारण उनका उत्कर्ष न चाहने वाले कुछ लोग उनसे चिढ़ते भी थे। उनके धैर्य की परीक्षा के लिए एक दुष्ट को नियुक्त किया। नदी के मार्ग में वह एक पेड़ की शाखा पर छिपकर बैठ गया। एकनाथ जी स्नान करके लौटे तो उसने उनपर थूक दिया। एकनाथ जी लौटे और पुनः स्नान कर लिया। दुबारा थूकने पर फिर स्नान किया। इस तरह बार-बार थूकने पर  उन्हें नदी में सौ बार स्नान करना पड़ा फिर भी उनके मन में किञ्चित् भी क्षोभ न हुआ। दुष्ट घबराया, पश्चात्तापतप्त वह एकनाथ जी के चरणों में गिर पड़ा-

         ‘प्रभो, क्षमा करें, मैंने बड़ा अपराध किया।’

       ‘नहीं भाई,  तूने तो आज बड़ा उपकार किया’, उसे उठाकर अपने हृदय से लगाते हुए एकनाथ जी ने कहा – ‘नित्य तो मैं एक ही बार स्नान करता था। तेरे कारण आज मुझे सौ बार जाह्नवी स्नान का सौभाग्य मिला।’  

 

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