‘भगवान् ने क्या किसी विशेष रूप का ठेका लिया है?’

   एक भक्त को रात्रि में स्वप्न में भगवान् ने कहा – ‘कल मैं तुम्हारे घर आऊँगा।’

     भक्त ने दूसरे दिन बड़े उत्साह से घर की सफाई करवाई और प्रतीक्षा करने लगे भगवान् के पधारने की। 

     एक भूखा-प्यासा फटे चीथड़ों में लिपटा भिखारी सामने आया। चिढ़कर बोले – ‘हटो, हटो ! आज मेरे घर में भगवान् आने वाले हैं।’

     एक वृद्धा आयी काँपती, खाँसती लाठी टेकती हुई- ‘बाबा, बड़ा बुखार है ! कुछ पहनने को दे दो।’ भक्त जी ने नौकर से कहकर उसे भी हटा दिया। एक छोटा सा नंग-धड़ंग बालक साँवला -सा मैला-कुचैला आया, पैसा माँगने लगा। भक्त जी दुत्कार कर बोले-‘सबेरे से ही परेशान कर रखा है इन लोगों ने। जानते नहीं, हमारे यहाँ भगवान् पधारने वाले हैं। अरे, है कोई ? हटाओ इसे यहाँ से।’ भक्त जी दिन भर  भगवान् के शुभागमन की प्रतीक्षा करते-करते थक गए। रात्रि में पुनः स्वप्न हुआ। भगवान् ने कहा – ‘भक्त जी’ मैं दीन – दुःखी, दरिद्र, भूखे और आर्त्त के रूप में तुम्हारे सामने आया, तुम पहचान न सके। मैंने कब कहा था कि छत्र  मुकुट लगा कर ही आऊँगा ! क्या किसी विशेष रूप में तुम्हें दर्शन देने का मैंने कोई ठेका लिया था ?’ 

 

new sg

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