‘साधक की सिद्धि’

    जितनी निष्ठा होती है,उनकी अपनी-अपनी एक प्रक्रिया होती है। उनमें साधन क्या होता है, स्थिति क्या होती है और फल क्या होता है – यह सब बिलकुल पक्का होता है। अब जिसके हृदय में ईश्वर की भक्ति है, उसका बल है ईश्वर का विश्वास। चाहे रोग आवे, चाहे शोक आवे, चाहे मोह आवे कि लोभ आवे, कि मृत्यु आवे, चाहे  विरोध आवे- हर हालत में उसका विश्वास बना रहना चाहिए कि ईश्वर हमारी रक्षा करेगा। सम्पूर्ण विपत्तियों को सहन करने के लिए ईश्वर पर विश्वास आत्मबल देता है। 

    अब एक आदमी की अद्वैत-निष्ठा है। तो उसके जीवन में भी रोग आवेगा, शोक और मोह के अवसर आवेंगे। कभी पाँव फिसल भी जायेगा  और कभी ठीक आगे भी बढ़ेगा, कभी मृत्यु आवेगी। ऐसे में उसका बल यह है कि मैं नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त ब्रह्म हूँ- इन परिस्थितियों से मेरा न तो कुछ बनता है और न बिगड़ता है। ये तो मृग-मरीचिका हैं, मायामात्र हैं, अपने स्वरुप में कुछ नहीं हैं। इस निष्ठा के बल के सिवाय यदि वह यह कहने लगे कि हे ईश्वर, हमको बचाओ। तो उसकी निष्ठा कच्ची है। 

    अब कोई मंत्र का जप करता है तो अपने मंत्र पर उसका विश्वास है कि मंत्र हमारी रक्षा करेगा। पर, कोई काम पड़ा, कोई रोग आया, कोई समस्या आयी अथवा मृत्यु का अवसर आया और वह अपना मंत्र छोड़कर भगा दूसरे मंत्र की शरण में, तो वह अपनी निष्ठा से च्युत हो गया। बल हमेशा अपनी निष्ठा का होना चाहिए। 

    अब एक योगी, जो समाधि लगाने का अभ्यास करता है और उसके जीवन में कोई रोग,मोह,शोक का प्रसङ्ग आता है तो वह यदि कहता है कि हे ईश्वर बचाओ अथवा आत्मा तो नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त है- उसकी निष्ठा पक्की नहीं। उसको तो तुरन्त अंतर्मुख हो जाना चाहिए। ऐसी शक्ति उसके अन्दर होनी चाहिए कि तुरन्त चित्त-वृत्ति का निरोध हो जाये। कहीं कुछ नहीं। 

    अब ज्ञानी-पुरुष के जीवन में जो कठिनाई आती है, उसको मंत्र जप करके पार नहीं करता, उसको वह देवता के बल पर पार नहीं करता, ईश्वर की प्रार्थना करके पार नहीं करता। वह जानता है कि अपने सच्चिदानन्द स्वरूप में यह सब स्फुरणा-मात्र है। इनकी कोई कीमत ही नहीं है। 

   तो नारायण, तब तक अपनी निष्ठा को पक्की नहीं समझना, जब तक अपनी निष्ठा के अतिरिक्त और किसी का सहारा लेना पड़ता हो। अपने घर में जो बैठने का अभ्यास है, वह साधक की सिद्धि का  लक्षण है और जो पराये घर में बैठ कर आँधी , तूफ़ान से बचते हैं,  उनकी निष्ठा पक्की नहीं है।  अपनी निष्ठा पक्की  करनी चाहिए।    

नव संवत्सर मंगलमय हो !

new sg    

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