‘भक्त के बदले भगवान् मरने को तैयार’

     भगवान् करुणा-वरुणालय हैं। वे अपने भक्त के अपराध को सम्भाल लेते हैं, भक्त की त्रुटि को अपनी त्रुटि समझते हैं।

     भगवान् राम अयोध्या में विराज रहे थे। विभीषण लंका का शासन कर रहे थे। वे शिव भक्त थे। नित्य प्रातः लंका से पैदल चल कर श्रीरंगक्षेत्र आते और जम्बुकेश्वर महादेव का पूजन-अर्चन कर लौट जाते। यही उनका नित्यका क्रम था। एक दिन त्वरा में उनके पैर की ठोकर लग जाने से मार्ग में बैठा हुआ एक वृद्ध ब्राह्मण मर गया। नगर में कोलाहल मच गया। विभीषण पकड़ लिए गए। जंजीरों से बाँधकर उन्हें बंदीगृह में डाल दिया गया। अनेक प्रकार की यातनाएँ दी गयीं; किन्तु वे मरे नहीं। भगवान् की कृपा और वर उन्हें प्राप्त जो थे। लौटकर जब वे लंका नहीं पहुँचे, अनेक दिन बीत गए, सभी पुरवासियों को चिंता हुई। संवाद अयोध्या पहुँचा। भगवान् श्रीराम सुनकर उदास हो गये। शिवजी ने भी यह बात उन्हें बतलायी। भगवान् करुणा-वरुणालय हैं। अपने भक्त का संकट उनसे देखा न गया, स्वयं श्रीरंगक्षेत्र पहुँचे। ब्राह्मणों ने राक्षसराज को उनके सम्मुख उपस्थित किया और प्रार्थना की – ‘इसने ब्राह्मण की हत्या की है, हमारे मारने से यह मरा नहीं। आप चक्रवर्ती सम्राट् हैं, आप न्याय करें और इसे दंड दें।’

     भगवान् ने कहा – ‘ब्राह्मणों, लोक में यही प्रसिद्ध है कि सेवक का अपराध स्वामी का ही होता है। इस विधान के अनुसार विभीषण के अपराध का दंड मुझे मिलना चाहिए, क्योंकि यह मेरा भक्त है। इसका अपराध मेरा अपराध है। मेरा मरना कहीं अच्छा है, मेरे भक्त का नहीं –

वरं ममैव मरणं मद्भक्तो हन्यते कथम् । 

राज्यमायुर्मया दत्तं तथैव स भविष्यति ।।

भक्तापराधे सर्वत्र स्वामिनां दण्ड इष्यते। ‘

     भगवान् की करुणापूर्ण वाष्पगद्गद् वाणी सुनकर सभी सभासद विह्वल हो गए।  ‘धन्य-धन्य’ ‘जय-जय’ के तुमुल घोष से आकाश गुंजरित हो उठा। विभीषण मुक्त कर दिए गए।   

 

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