‘भगवद्-राग’

   राग की धारा को बदल देना, यह उपासना है। जो सौ – सौ झरने राग के बहते जा रहे थे, उनको रोककर केवल एक झरना बहे। 

        नारायण, ये रागी लोगों से पूछो कि तुम्हारा किस एक वस्तु से राग है ?खाये बिना रह न सकें, पहनें बिना रह न सकें, सोसाइटी के बिना रह न सकें, सिनेमा देखे बिना रह न सकें, चौपाटी पर जाए बिना रह न सकें ! थोड़ा बच्चे से, थोड़ा पत्नी से, थोड़ा पति से, थोड़ा माता से, थोड़ा बाप से- दुनिया में तो राग को बिखेर कर रखना पड़ता है। इस राग की विकीर्णता को ईश्वर की ओर उन्मुख कर देना, इसका नाम उपासना है, भक्ति है। उसमें एक तारीफ़ की बात और है। भक्ति में जो राग है, वह अनमिले और अनदेखे साजन से है। आप यह न समझना कि राग को पूर्ण करने के लिए यह उपाय महात्माओं ने बताया है। यह तो अंग-संग की वासना पूरी होकर थोड़े-ही मिटेगी ! अंग-संग की वासना का सत्यानाश ही होगा न !क्योँकि, जब अनदेखा, अनमिला साजन और अपने राग की ललित-वृत्ति, प्रिय-वृत्ति उसके साथ जोड़ दी; तो क्या उस अनमिले, अनदेखे साजन से अंग-संग होगा ? क्या उससे बच्चे पैदा होंगे ? क्या वह धन कमाकर लाकर देगा ? नारायण, वैराग्य नहीं होगा तो भक्ति होगी ही नहीं और भक्ति नहीं होगी तो सालम्बन वैराग्य नहीं होगा ! यह आपको इसलिए बताया कि यह महात्माओं ने भक्ति के रूप में निर्मली-बूटी ही डाली है। जैसे पानी में जो गन्दगी होती है, उसको साफ़ करने के लिए फिटकरी हाथ में लेकर घुमा देते हैं या निर्मली-बूटी का चूरा डाल देते हैं। अब वह निर्मलीबूटी का चूरा स्वयं चूरा है। लेकिन पानी की गन्दगी को हटा कर वह स्वयं भी बैठ जायेगा। तो यह भगवद्-राग देह-संग की वासना का पोषक नहीं है, निवारक है। देहासक्ति को मिटाने वाला है। भोगवासना को क्षीण करने वाला है।     

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