‘चित्रशाला की महिमा’

  1. यह संसार एक चित्रशाला है, आर्ट गैलरी।
  2. अनेक प्रकार के चित्र हैं इसमें – शान्त, करुण, अद्-भुत वीर, शृङ्गाररस प्रधान। 
  3. चित्र बड़े सुन्दर हैं; परन्तु नाम और रूप के अतिरिक्त कुछ नहीं। 
  4. चित्र-भेद के अनुसार मन में भिन्न-भिन्न भाव और रस का उद्दीपन भी होता है, फलतः हम उन्हें देखकर सुखी या दुःखी होते हैं। 
  5. चित्रशाला के चित्रोंका स्पर्श वर्जित है; हम छूना चाहें तो भले छू लें; परन्तु नाम रूप के सिवा वहाँ कुछ है नहीं। उन्हें छूने पर मन की शान्त, करुण आदि स्थितियाँ होकर हम विषाद या आनन्द में भर सकते हैं। 
  6. चित्रशाला से बाहर आने पर, चित्र के सौन्दर्य पर उसके कलाकौशल पर उसके निर्माता पर दृष्टि जाती है उसकी हम प्रशंसा करते हैं। वस्तुतः आनन्द चित्र में नहीं, उसके कलाकौशल से हुआ और यह कौशल उसके चितेरे का है। 
  7. इस सृष्टि का चितेरा- चित्रकार- कारीगर परमात्मा है। उसके द्वारा सृष्ट हम प्रत्येक रस का उसकी पूर्णता का अनुभव करते हैं, और उसकी प्रशंसा करते हैं, करनी ही चाहिये। 
  8. वस्तु-तस्तु वह चित्रकार मैं ही हूँ, परमानन्द का समुद्र। 
  9. चित्र भी मैं ही हूँ, चित्रकार भी मैं ही हूँ और उसके भिन्न-भिन्न रस (शान्त आदि ) भी मैं ही हूँ। रस, रस्य और रसिक भी मैं ही हूँ। अन्य की सत्ता ही नहीं है। तब त्रिपुटी मिट गयी, समाधि लग गई। वस्तुतः समाधि भी आत्मा का विलास-मात्र है। अपने अतिरिक्त कोई चीज़ न थी, न है और न कल्पना की जा सकती है।  सच्चिदानन्द  घन। 

 

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‘पसन्द का संसार’

प्रश्न- अनादिकाल से इस संसार को सँवारने सुधारने का प्रयास चल रहा है। यह कितना सुधर जायेगा, तब तुम इसे पसन्द करोगे ?

उत्तर- संसार का स्वभाव ही सड़ना है, बिगड़ना है। इसे राम, कृष्ण, शङ्कर, रामानुज, बुद्ध, महावीर, गाँधी- सबने सुधारने का प्रयत्न किया; परन्तु यह अपनी गति से बहता जा रहा है। किसी के रोके न रुका, किसी के सँवारे न सँवरा। योगी अरविन्द के अथक प्रयत्न के बाद भी धरती पर स्वर्ग नहीं उतरा। इसलिए कोई भी मुमुक्षु इसकी दिव्यता पर विश्वास नहीं कर सकता। वह तो दृश्य से मुक्त होकर अपने द्रष्टा स्वरुप में, बन्धन से छूट कर अपने मुक्त स्वरुप में स्थित होने के लिए ज्ञान सम्पादन करेगा। सुधारने की चेष्टा सब अपनी-अपनी वासना के अनुसार करते हैं। काम पूरा नहीं होता, समय पूरा होता है। परमात्मा उसको मिलता है  जो इसकी ओर से आँख बंद करके उसको पाने के लिए चल पड़ता है। चिन्मात्र ब्रह्म में गोलोक भी स्फुरण है और धरती भी। स्फुरणमात्र में बनाने-बिगाड़ने की क्या आवश्यकता ?

 

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‘उपलब्धि ही सुख है’

प्रश्न- सुख इष्ट है या सुख की उपलब्धि (ज्ञान) ?

उत्तर- उपलब्धि के अतिरिक्त सुख कुछ नहीं है। उपलब्धि न हो तो सुख क्या ?

प्रश्न- ठीक है, परन्तु उपलब्धि का विशेष आकार सुख है।

उत्तर- फिर तो वह नाशवान् और दुःखपरिणामी होगा; क्योंकि आकार एक-से नहीं रहते, बदलते रहते हैं।

प्रश्न- ऐसा क्यों ?

उत्तर- तत्त्व नित्य होता है, आकार नहीं। अनुपलब्ध सुख की सत्ता नहीं है। उपलब्धिमात्र ही सुख है।

प्रश्न-  सुख की क्षणिकता से उपलब्धि भी क्षणिक क्यों नहीं ?

उत्तर- क्षणिकता उपलब्धि का विषय है। इसलिए उपलब्धि अकाल है। आकारगत क्षणिकता उपलब्धि में आरोपित। उपलब्धि ही सुख है। अकाल ही सत्य है। 

प्रश्न- उपलब्धि मात्र ही सुख है, क्या अभिप्राय ?

उत्तर- चाहे जिस आकार की उपलब्धि हो, वह उपलब्धि का परिणाम नहीं, विवर्त्त ही है। इसलिए कोई भी आकार प्रतीत हो अर्थात् सभी आकार तत्त्वतः उपलब्धि  स्वरुप ही हैं। उपलब्धि ही सुख है, उसका आकार चाहे सुख हो, दुःख हो या और कुछ। जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वही तो सुख है। यह भावना नहीं, सत्य है। 

 

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प्रसङ्गों में सूक्तियां

     एक बार श्रीमहाराजजी से बात हो रही थी, तभी किसी व्यक्ति ने कहा – ‘आम जनता मन्दिरों के उत्सव की भीड़भाड़ में बहुत जाती है, पर मुझे भीड़ में जाना नहीं रुचता। मैं तो एकान्त में बैठ कर भजन करना अधिक श्रेष्ठ मानता हूँ।’

     श्रीमहाराजजी ने कहा- ‘भैया ! तुम तो केवल दो तोले की जीभ को ही प्रभु सेवा में लगाते हो और वे दो मन के शरीर को ले जा कर प्रभु की सेवा में उपस्थित होते हैं।’

     यह सुनकर वह बिलकुल नम्र हो गया। 

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     एक बार हम श्रीमहाराजजी के पास बैठे थे। उसी समय किसी ने उनके हाथ में एक पुस्तक दी और उसकी भूलें शुद्ध कर देने की प्रार्थना की। श्रीमहाराजजी ने कहा- ‘मुझे किसी की गलती नज़र नहीं आती; क्योंकि ईश्वर की बनाई सृष्टि में कहीं दुःख व दोष नहीं है।’

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     एक बार सत्सङ्ग हो रहा था। एक व्यक्ति के बारे में किसी ने महाराजश्री से कहा- ‘उसे तो उच्छिष्ट-अनुच्छिष्ट का कोई विचार ही नहीं है।’ महाराजश्री ने उत्तर दिया – ‘वह अपने भाव में मग्न हमेशा जगन्नाथपुरी में रहता है और वहाँ इस बात का कोई विचार नहीं माना जाता। 

 

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