‘श्रीकृष्ण-चरित्र’

     श्री कृष्ण के पास जितना वैभव था, जितना सुख था, अब उससे अधिक आप संसार में बनाने की कल्पना मत कीजिये। सोने की द्वारिका, 16 हज़ार  पत्नियों के साथ  16 हज़ार महल और वहाँ  दीया नहीं जलते हैं, वहाँ  हीरे जलते हैं। सोने के महल और हीरे की रोशनी। अरे नारायण ! यह देखो लोभ की पूर्ति इससे बड़ी और क्या हो सकती है ? 16 हज़ार पत्नी और ईश्वर की कृपा से ढाई-तीन लाख पुत्र ! और, अरबों-खरबों की सेना। इससे बड़ा परिवार आप बना नहीं सकते हैं भला ! श्री कृष्ण से ज्यादा रिश्तेदार- नातेदार आपके बनेंगे,वह तो संभव नहीं है। तो कामना की पूर्ति ऐसे। और, क्रोध की पूर्ति ऐसे महाराज कि जो दुश्मनी करे उसको मार डाले। आप चाहते हैं कि धरती पर हमारे दुश्मन न रहें तब हम सुखी होंगे ! तो कृष्ण ने यह करके भी देख लिया। दुश्मनी करने वालों को मार दिया। कामना की पूर्ति के लिए इतनी भोग-विलास की सामग्री रखी; लोभ की पूर्ति के लिए इतना धन हुआ; ऐश्वर्य की दृष्टि से कितने राज्य बनाये और बिगाड़े। उग्रसेन सरीखे बुड्ढे को ‘राज्य लोलुपं’  कंस को मारकर राजा बना दिया। और, उनको जिंदा कबतक रखा ? जब श्री कृष्ण परमधाम चले गए, उसके बाद उग्रसेन की मौत हुई। नाना-परनाना, दादा-परदादा सब जिन्दा रहे। लेकिन उन कृष्ण को क्या हुआ ?महल छोड़ देना पड़ा। मथुरा छोड़ कर भागना पड़ा सो अलग, द्वारिका छोड़कर भी भागना ही पड़ा। सातवें दिन द्वारिका डूब जायेगी, निकलो यहाँ से !

     उनकी पत्नियों की क्या दशा हुई ? अर्जुन को मार-मारकर गुण्डे छीन ले गये। बेटों की क्या दशा हुई ? महाराज, शराब के नशे में चूर एक-दूसरे से लड़ें। कृष्ण के देखते-देखते आपस में लड़कर मर गये और जो नहीं मरे, वे कृष्ण के ऊपर टूट पड़े कि हम तुमको मारेंगे। तब बलराम और कृष्ण ने स्वयं अपने हाथों से अपने बच्चों का संहार किया।

     तो नारायण, अब आप दुनिया में क्या बनाना चाहते हो ? हम ईश्वर की बात नहीं करते हैं। आप अपनी दृष्टि से विचार करो। देखो, जन्म हुआ जेल-खाने में। जाकर रहना पड़ा एक अहीर के घर में।  गाय चराने का काम करना पड़ा। अपने मामा को अपने हाथ से मारना पड़ा। दुश्मन ने 18 बार बड़ी भारी सेना लेकर नगरी पर चढ़ाई की। अपना नगर छोड़कर भागना पड़ा। भीख मांगते हुए जाना पड़ा- पांव में जूता नहीं, सिर पर टोपी नहीं, शरीर पर कपड़ा नहीं। पहाड़ पर दो महीना छिप कर रहना पड़ा। साधुओं के आश्रमों में जा-जाकर रोटी खानी पड़ी। आग लगी तो वहाँ से कूद कर जाना पड़ा। 

     नारायण, देखो जीवन के बारे में आपकी जो यह कल्पना है कि हम हमेशा सुखी रहें और सुखी रहेंगे; वह दुनिया को अपने साथ जोड़कर कभी सुखी नहीं रह सकते। आप जो यह चाहते हो कि हमारे पास बहुत स्त्री-पुत्र होवें, बहुत सारा धन-दौलत हो, बहुत से मकान हों,बहुत-सी हुकूमत हो, बहुत से भोग हों और दुश्मनों को हम मार डालेंगे, तब हम सुखी होंगे- यह केवल एक ख़्याली पुलाव है, एक ख़्वाब  है। ऐसे कोई जिन्दा नहीं रह सकता। 

     तो देखो, एक ओर परमेश्वर ! यह श्रुति का सार है, ‘परीक्ष्य लोकान् कर्म चितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायात् नास्त्यकृतः कृतेन’। आओ, परीक्षा करो – जो तुम बनाओगे, वह ढह जाएगा। जो जोड़ोगे,वह टूट जाएगा। जितना जोड़ोगे, वह टूट जाएगा। जितना बनाओगे, वह बिगड़ जायेगा। 

जो फरा सो झरा, जो  बरा सो बुताना   ।।     

     श्रीमद्भागवत के तीसरे स्कन्ध में यह श्लोक आता है,

‘गृहमेधेषु लोकेषु विराग समजायत। 

     श्री कृष्ण के मन में वैराग्य हुआ। वे केवल राग के देवता नहीं हैं, वैराग्य के देवता हैं। उन्हें संग्रह से वैराग्य हुआ, उन्हें महल से वैराग्य हुआ, उन्हें पत्नी-पुत्र से वैराग्य हुआ, उन्हें अपने काम-धन्धे से वैराग्य हुआ। 

     तो नारायण, आप श्री कृष्ण को क्या समझते हैं ? केवल उनके जीवन में राग था ? क्योंकि, राग होता तो वे ब्रज की गोपियों को छोड़ कर मथुरा जा सकते थे ? राग होता तो कहते कि मथुरा हमारी जन्मभूमि है, हम मरेंगे तो यहीं मरेंगे! मथुरा में ही रहते ! लौटकर फिर ब्रजभूमि में नहीं आये, यह उनकी असंगता है। वे धर्मात्मा भी हैं और धर्म से ऊपर भी हैं। वे यशस्वी भी हैं, वे कलंकी भी हैं।  वे ऐश्वर्यशाली भी हैं और नारायण, भीख माँगने वाले भी हैं। वे ज्ञान में भी हैं, अज्ञान में भी हैं। वे राग में भी हैं, वे विराग में भी हैं। 

     आओ भाई, राग भी चाहिए जीवन में ! पर केवल राग करोगे, फँस जाओगे। वैराग्य भी चाहिए जीवन में। पर केवल वैराग्य करोगे, रूखे हो जाओगे ! अमृत पीओगे, नशे में आ जाओगे।  विष पिओगे, मर जाओगे ! चाँदनी में ज्यादा रहोगे ठंडे हो जाओगे ! ज्यादा सूर्य की रोशनी में रहोगे, जल जाओगे। यह जीवन ऐसे बिताने का नहीं है।  

new sg

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