‘अनपायनी भक्ति’

 

     देखो, प्रेम ऐसा होना चाहिए जो क्षण-क्षण बढ़े –

छिनहि बढ़ै छिन ऊतरे सो तो प्रेम न होय। 

     जो प्रेम क्षण भर में  बढ़ जाता है और क्षण भर में घट जाता है, उसका नाम प्रेम नहीं है। प्रेम तो प्रतिक्षण वर्धमान- बढ़ता ही रहता है। ऐसी ही प्रीति होनी चाहिए। 

    इसलिए भक्त लोग चाहते हैं कि भगवान् के चरणों में हमारी ऐसी भक्ति हो जो बढ़ती रहे। भक्ति माने प्रीति-विशिष्ट वृत्ति। जो प्रेमरस से सराबोर अपने अतःकरण की वृत्ति है, उसीको भक्ति कहते हैं। उसमें योग के समान अभ्यास एवं वैराग्य की प्रधानता नहीं है और वह धर्मानुष्ठान के समान कोई क्रिया-कलाप भी नहीं है। जो वृत्ति अपने हृदय में भगवान् के प्रति प्रीतिरस से सराबोर है और बारम्बार अपने इष्टदेव का स्पर्श करने वाली, आलिंगन करने वाली है, उसी को भक्ति कहते हैं। 

     वह भक्ति अनपायनी हो- इसका अर्थ होता है कि उसमें अपाय न हो। अपाय माने नाश भी होता है और श्वास भी होता है। हमारी भक्ति भगवान् के चरणों में हो और वह दिनों-दिन बढ़ती जाय, कभी घटे नहीं। इसीकी की कामना करते हुए तुलसीदास जी कहते हैं-

अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरवान। 

जनम – जनम रति  रामपद यह वरदान न आन ।।

     यह नहीं कि हम भगवान् की भक्ति करें, उनकी लीला-कथा सुनें और कहें कि यह कथा तो एक अधूरी चीज़ है, इससे हमें मोक्ष मिल जाये तो ठीक है। अरे भाई, तुम जिस समय कथा सुनते हो, उस समय मुक्त ही रहते हो। 

     यदि यह कहो कि हम कथा सुनकर यज्ञशाला में जायें, धर्म करें, तो आपने कथा को अधूरी कर दिया। कथा सुनना ही क्या सबसे बढ़िया वस्तु नहीं है कि हम भगवान् की लीला सुन रहे हैं ,उनके चरित्र का चिन्तन कर रहे हैं। और,यदि कहो कि हम कथा सुनेंगे तो हमें स्वर्ग मिलेगा,भोग मिलेगा;तो भाई,भगवान् की भक्ति करके उनसे भोग एवं मोक्ष मत खरीदो। भक्ति पैसा देने जैसी चीज़ और मोक्ष उसके बदले में मिठाई पाने जैसी नहीं है। हमें भोग मिले, मोक्ष मिले और इसके लिए हम यज्ञशाला में जाकर धर्म करें- यह भक्ति का उद्देश्य नहीं है। पहले लोग भगवान् की भक्ति करते थे भगवान् से मिलने के लिए, भगवान् का ज्ञान प्राप्त करने के लिए, अंतःकरण की शक्ति के लिए। भक्ति से कुछ पाना- यह अभीष्ट नहीं होता था। लेकिन अब जबसे कलियुग आ गया है, तबसे लोग भक्ति करके धर्म और मोक्ष चाहने वाले भी कम हो गए हैं, अब तो अर्थ-काम चाहने वाले ही ज्यादा मिलते हैं, जो कहते हैं कि हम भगवान् की लीला देखें- करें-करायेंगे, कथा सुनें-सुनायेंगे तो उसके द्वारा हमें अर्थ की प्राप्ति होगी। यह कलियुग का माहात्म्य है कि भगवान् की भक्तिस्वरूपा जो कथा है, उससे हम अर्थ,काम की प्राप्ति चाहते हैं। अरे भाई, भगवान् की भगवत्स्वरूपा कथा के द्वारा हमें अर्थ-काम की कौन कहे, धर्म और मोक्ष की भी अभिलाषा नहीं करनी चाहिए। भागवत के दसवें स्कन्ध में कहा गया है कि –

न परिलषन्ति केचिदपवर्गमपीश्वर ते। 

                   चरणसरोज-हंस-कुलसङ्गविसृष्टगृहाः।।  (10-87-21 )

     वे लोग अपवर्ग भी नहीं चाहते हैं, जिनके हृदय में भगवान् की कथा का प्रेम, भक्ति आ जाती है। जब हम भक्ति के बदले कुछ और चाहने लगते हैं तो वह भक्ति नौकरी की भक्ति हो जाती है, सहज भक्ति नहीं रहती है। इसलिए हे भगवान् ! ऐसी कृपा करो कि हमारे मन में तुम्हारी भक्ति करके अर्थ-धर्म-काम-मोक्ष कुछ भी पाने की इच्छा न हो। 

     यद्यपि भगवान् कल्पतरु हैं, भागवत कल्पतरु है और भक्ति भी कल्पतरु है- उससे आप जो माँगेंगे वह सब आपको मिलेगा, फिर भी भक्ति को ही माँगिये। भक्ति से भक्ति को बढ़ाते रहिये। ‘अनपायनी’ का अर्थ यह है की भक्ति कभी हमसे दूर न हो, उसका ह्रास न हो और वह दिन-दूनी, रात-चौगुनी भगवान् के चरणों में बढ़ती जाए। ऐसी भक्ति को ‘अनपायनी’ भक्ति कहते हैं।     

 

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