शरणागति :विभिन्न सम्प्रदाय

 

                  नारायण ,शरणागति जैन -सम्प्रदाय में भी है। जैन भाषा में इसे ‘आत्त -शरणो -भव ‘ बोलते हैं। आत्त माने आत्मा। यानी आत्मा की शरण में रहो। उनका कहना है कि यह सृष्टि पुद्गलों से बनी हुई है और इसमें अनादिकाल से संस्कारों की धारा बह रही है और जीव जन्मसे मृत्यु और मृत्युसे जन्ममें प्रभावित हो रहा है। अतः इनका आश्रय छोड़कर अपनी उस आत्माकी शरण लो ,जिसमें न राग है ,न द्वेष है ,न जन्म है और न मृत्यु है। इसको ‘आत्त शरणो भव ‘बोलते हैं। जैन -धर्ममें महावीरकी ,ऋषभदेवकी ,पार्श्वनाथकी शरण मुख्य नहीं है। वहाँ आत्म -शरण होना ही मुख्य है।   जो भी आत्म -शरण ,आत्म -निष्ठ हो गया ,वह निर्भार होनेके  कारण, सिद्ध-शिला पर बैठकर अलोकाकाश जानेका अधिकारी हो गया। 

          शरणागति बुद्ध -धर्ममें भी है। पर ,वहाँ शरणागति जरा दूसरे ढंग की है। इसमें -बुद्धं शरणं गच्छामि ,धर्मं शरणं गच्छामि ,संघं शरणं गच्छामि है।  तत्त्व -दृष्टि से बुद्धकी शरणागति है ,साधन -दृष्टिसे धर्मकी शरणागति है और आचार -दृष्टिसे संघकी शरणागति है। 
      
              शरण शब्दका प्रयोग बौद्ध -धर्ममें भी है और जैन -धर्ममें भी है और वेदान्तमें भी है ही। पर विशेषता यह है कि बौद्ध -धर्ममें बुद्ध -शरण है और जैन -धर्ममें आत्म -शरण है। बुद्धकी शरणमें हो जाना बुद्धकी करुणाकी पराकाष्ठा है और अपनी शरणमें आप हो जाना पौरुषकी पराकाष्ठा है। करुणा -प्रधान बौद्ध -धर्म है और अहिंसा -प्रधान जैन -धर्म है। न्याय -वैशेषिकमें शरणागतिका कोई प्रसङ्ग ही नहीं है। उसमें तो सभी पदार्थ ऐसे हैं कि यदि साधर्म्य -वैधर्म्य के द्वारा उनका ज्ञान ठीक – ठीक हो जाये तो मुक्ति हो जाती है। उसमें कोई लोक नहीं है। सांख्य -योगमें साधनके रूपमें ईश्वरप्रणिधान एवं अन्ततः आत्म -स्थिति ही शरण है। पूर्व -मीमांसा और वेदान्तमें अन्तःकरणकी शुद्धिके द्वारा परमात्माका साक्षात्कार मानते हैं। अब भक्ति -दर्शन बड़ा विलक्षण है। उनका मानना है कि भगवान् का एक नाम शरण है और दूसरा जो शरण -भाव है सो अर्थात् एक ,शरण -रूप भगवान् और दूसरा शरणागतिका भाव -माने उपाय और उपेय ,साधन और साध्य दोनों प्रभु ही हैं। वही मिलनेवाले और वही मिलानेवाले। 
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