‘ गुणेषु सक्त्तं बन्धाय रतं वा पुंसि मुक्तये ‘

 

                            ‘ गुणेषु सक्त्तं बन्धाय रतं वा पुंसि मुक्तये ‘ I
                                                       (श्रीमद्भागवत ३/२५ /२५ )
           ‘यदि विषयों में आसक्ति करोगे तो संसार में बन्धन होगा और भगवान् से प्रेम करोगे तो मुक्ति मिलेगी ‘ !
            संसार रस्सी से नहीं बाँधता किसी को !यह तो आसक्ति से बाँधता है। यदि संसार में प्रेम हो गया तो बँधे रहोगे संसार में और परम पुरुष परमात्मा से प्रेम हो गया तो मुक्ति हो जायेगी। चलना प्रेम के मार्ग में और पाँव फूंक -फूंककर रखना ,यह नहीं होता है। जब रुचि पैदा होती है भगवान् में ,तो प्यास बढ़ जाती है ;फ़िर यह नहीं होता कभी कि सुनने में क्या रखा है ?यह अन -प्यासे का लक्षण है। जिसको भीतर से प्यास नहीं लगी है ,वही ऐसा सोचता है। नहीं तो भगवान् का एक -एक नाम ,एक -एक गुणानुवाद ,लीला ,उनका स्वभाव ,उनका प्रभाव ,उनका तत्त्व ,उनका रहस्य ,उनका स्वरूप -इन सबका श्रवण करने में ऐसी रुचि होती है कि आदमी को भोजन अच्छा नहीं लगता ,कथा अच्छी लगती है। शर्बत पीना अच्छा नहीं लगता ,कथा अच्छी लगती है। डर नहीं लगता किसी का ,शोक नहीं आता ;परन्तु इन साधन -भजन से वंचित मनुष्य दूसरे की याद करके रो रहे हैं। 
            अरे !भगवान् तो तुम्हारे दिल में खड़े होकर ,दोनों हाथ फैला कर कह रहे हैं- ‘आओ, आओ ! हमारे हृदय से लग जाओ ‘!वह तो प्यार करने केलिये खड़े हैं और तुम रो रहे हो ?किसके लिये ?संसार के लिये !हे भगवान् !!
          नारायण ,जो एकबार भगवान् से जुड़ जाता है ,उसको फ़िर संसार में मोह नहीं होता। 
new sg

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