“ईश्वरकी अप्राप्तिका कारण”

 

                  ईश्वर के सम्बन्ध में यह बात ध्यानमें रख लें कि वह इस कालमें, वर्तमानमें न हो तो किसी कालमें नहीं होगा; क्योंकि वह कालसे कट गया, परिच्छिन हो गया। वह इस स्थान, देशमें न हो तो किसी स्थान में नहीं होगा; क्योंकि तब वह देशसे कट गया, परिच्छिन हो गया। वह इन्हीं रूपों -विषयोंमें न हो तो किन्हीं रूपोंमें नहीं होगा; क्योंकि तब वह विषय परिच्छिन हो गया। हम लोगोंमें ईश्वर न हो तो फिर कहाँ हो सकता है ?ईश्वरका अभी ,यहीं और इन्हीं रूपोंमें होना आवश्यक है। ऐसी अवस्थामें ईश्वरकी अप्राप्तिका कारण क्या है ?उसको न पहचानना। 
                                       
                                       इसके लिये हमारे अन्तःकरणमें ,हमारी बुद्धिमें एक ऐसी ज्ञान -वृत्ति का उदय होना चाहिये ,जिससे हम परमात्माको पहचानें। हमारे चित्त में जो परमात्माके विषयमें अज्ञान है, वह दूर हो। नारायण ,ईश्वर है तो सभी के हृदय में, किन्तु वह सुप्त निष्क्रिय है। अतः अविद्याको निवृत्त करने वाला ,विक्षेपका निवर्तक ईश्वर हमारे हृदय में प्रकट हो ,इसकेलिये हमें कुछ करना पड़ेगा। तो देखो, अधिभूत रूपमें यह ईश्वर प्रकट ही है ,विराट् विश्व ईश्वर ही है और अधिदैव रूपमें भी ईश्वर ही इसका नियमन कर रहा है ,किन्तु अज्ञानकी निवृत्ति के लिये अध्यात्म रूपमें ईश्वरके प्रकट होनेकी आवश्यकता है। वृत्त्यारूढ़ हुये बिना ब्रह्म अविद्या निवर्तक होता नहीं। तो जब मनुष्यके जीवनमें अन्तःकरणकी शुद्धि तथा प्रकाशिका वृत्ति का उदय होता है ,जब दोनों एकत्र होते हैं ,तभी परमात्माका आविर्भाव होता है। 
new sg

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